पन्त की रचनाओं में प्रकृति का गहबर लोकरंग: बेशरम
जयंती पर याद किए गए सुमित्रा नंदन पंत-
करछना। प्रकृति की वादियों में झरबेरी की झुरमुट का हेमंत और बाग-बाग बगरे बसंत की अलौकिक छटा के अनूठे रचनाधर्मी सुमित्रानंदन पंत जी सचमुच प्रकृति के सुकुमार कवि थे।उनकी रचनाओं में रचे-बसे ऋतु लोकदर्शन की हृदयस्पर्शी अनुभूतियों का गहबर लोकरंग पूरी रागात्मिकता के साथ साहित्य कविता प्रेमी पाठकों के मन को बहुत करीब से छू जाता है। स्थानीय साधुकुटी स्थिति एसीआईटी संस्थान में कवि पंत की जयंती पर उन्हें याद कर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए यह बातें हास्य कवि अशोक बेसरम ने कही। वरिष्ठ गीतकार डॉ.राजेन्द्र शुक्ल और डा.वीरेन्द्र कुसुमाकर ने कहा कि प्रकृति और राष्ट्र प्रेम उनके स्वभाव का प्रबल पक्ष था। आकर्षक शरीर सौष्ठव,निर्मल मन,सेवक स्वभाव और अनूठा व्यक्त्तिव भी रचनाओं के साथ साथ बहुत प्रभावशाली था। सन्तोष शुक्ल समर्थ ने उनकी रचना और भाषा शैली को सहज,सरस और सरल की संग्या देते हुए उनकी कालजयी रचनाओं को याद किया। गीतकार जीतेंद्र जलज ने कहा कि छायावादी कवियों की पंक्ति में विशेष स्थान रखने वाले पल्लव,वीणा जैसी अमर कृति के रचनाकार पंत जी आजादी आंदोलन में भी सक्रिय रहे और पद्मभूषण से अलंकृत हुए।कवियों ने इस मौके पर उनकी सोच और लेखनी से प्रेरणा लेते हुए कवि के कृतित्व और व्यक्तित्व को याद कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। अध्यक्षता लोक कवि रामलोचन सांवरिया ने किया।इस मौके पर लोकगायक अवधनारायण यादव,रिंकू सिंह,राजेश शुक्ला, विपिन सिंह परिहार,कुंवर सिंह,अनुराग यादव समेत कई काव्यप्रेमी मौजूद रहे।









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