25 दिसंबर 1704 का दिन — 11 पौष जब छोटे साहिबज़ादों को सूबे की अदालत मे पेश किया …. संगत जी 10 पौष की शाम जब कोतवाली के थानेदार ने एक बैलगाड़ी में माता जी तथा बच्चों को सरहिन्द के नवाब वज़ीर ख़ान के पास कड़े पहरे में भिजवा दिया। वहाँ उन्हें सर्द ऋतु की रात में ठण्डे बुरज में बन्द कर दिया गया और उनके लिए भोजन की व्यवस्था तक नहीं की गई।
दूसरी सुबह 25 दिसंबर – नवाब वज़ीर खान जो गुरू गोबिन्द सिंघ जी को जीवित पकड़ने के लिए सात माह तक सेना सहित आनन्दपुर के आसपास भटकता रहा, परन्तु निराश होकर वापस लौट आया था, उसने जब गुरू साहिब के मासूम बच्चों तथा वृद्ध माता को अपने कैदियों के रूप में देखा तो बहुत प्रसन्न हुआ।
उसने अगली सुबह बच्चों को कचहरी में पेश करने के लिए फरमान जारी कर दिया। दिसम्बर की बर्फ जैसी ठण्डी रात को, ठण्डे बुरज में बैठी माता गुजरी जी अपने नन्हें नन्हें दोनों पोतों को शरीर के साथ लगाकर गर्माती और चूम-चूम कर सुलाने का प्रयत्न करती रहीं। माता जी ने भोर होते ही मासूमों को जगाया तथा स्नेह से तैयार किया। दादी-पोतों से कहने लगी ‘पता है ! तुम उस गोबिन्द सिंघ ‘शेर’ गुरू के बच्चे हो, जिसने अत्याचारियों से कभी हार नहीं मानी। धर्म की आन तथा शान के बदले जिसने अपना सर्वत्र दाँव पर लगा दिया और इससे पहले अपने पिता को भी शहीदी देने के लिए प्रेरित किया था। देखना कहीं वज़ीर ख़ान द्वारा दिये गये लालच अथवा भय के कारण धर्म में कमजोरी न दिखा देना। अपने पिता व धर्म की शान को जान न्यौछावर करके भी कायम रखना।
दादी, पोतों को यह सब कुछ समझा ही रही थी कि वज़ीर ख़ान के सिपाही दोनों साहिबजादों को कचहरी में ले जाने के लिए आ गये। जाते हुए दादी माँ ने फिर सहिबजादों को चूमा और पीठ पर हाथ फेरते हुए उन्हें सिपाहियों के सँग भेज दिया। कचहरी का बड़ा दरवाजा बँद था। साहिबज़ादों को खिड़की से अन्दर प्रवेश करने को कहा गया। रास्ते में उन्हें बार बार कहा गया था कि कचहरी में घुसते ही नवाब के समक्ष शीश झुकाना है। जो सिपाही साथ जा रहे थे वे पहले सर झुका कर खिड़की के द्वारा अन्दर दाखिल हुए। उनके पीछे साहबज़ादे थे। उन्होंने खिड़की में पहले पैर आगे किये और फिर सिर निकाला। थानेदार ने बच्चों को समझाया कि वे नवाब के दरबार में झुककर सलाम करें। किन्तु बच्चों ने इसके विपरीत उत्तर दिया और कहा: यह सिर हमने अपने पिता गुरू गोबिन्द सिंघ के हवाले किया हुआ है, इसलिए इस को कहीं और झुकाने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता।
कचहरी में नवाब वज़ीर खान के साथ और भी बड़े बड़े दरबारी बैठे हुए थे। दरबार में प्रवेश करते ही जोरावर सिंघ तथा फतेह सिंघ दोनों भाईयों ने गर्ज कर जयकारा लगाया– ‘वाहिगुरू जी का खालसा, वाहिगुरू जी की फतेह’। नवाब तथा दरबारी, बच्चों का साहस देखकर आश्चर्य में पड़ गये। एक दरबारी सुच्चानँद ने बच्चों से कहा: ऐ बच्चों ! नवाब साहब को झुककर सलाम करो। साहिबज़ादों ने उत्तर दिया: ‘हम गुरू तथा ईश्वर के अतिरिक्त किसी को भी शीश नहीं झुकाते, यही शिक्षा हमें प्राप्त हुई है’।नवाब वज़ीर खान कहने लगा: ओए ! तुम्हारा पिता तथा तुम्हारे दोनों बड़े भाई युद्ध में मार दिये गये हैं। तुम्हारी तो किस्मत अच्छी है जो मेरे दरबार में जीवित पहुँच गये हो। इस्लाम धर्म को कबूल कर लो तो तुम्हें रहने को महल, खाने को भाँति भांति के पकवान तथा पहनने को रेशमी वस्त्र मिलेंगे। तुम्हारी सेवा में हर समय सेवक रहेंगे। बड़े हो जाओगे तो बड़े-बड़े मुसलमान जरनैलों की सुन्दर बेटियों से तुम्हारी शादी कर दी जायेगी। तुम्हें सिक्खी से क्या लेना है ? सिक्ख धर्म को हमने जड़ से उखाड़ देना है। हम सिक्ख नाम की किसी वस्तु को रहने ही नहीं देंगे। यदि मुसलमान बनना स्वीकार नहीं करोगे तो कष्ट दे देकर मार दिये जाओगे और तुम्हारे शरीर के टुकड़े सड़कों पर लटका दिये जायेंगे ताकि भविष्य में कोई सिक्ख बनने का साहस ना कर सके।’’ नवाब बोलता गया। पहले तो बच्चे उसकी मूर्खता पर मुस्कराते रहे, फिर नवाब द्वारा डराने पर उनके चेहरे लाल हो गये।
इस बार जोरावर सिंघ दहाड़ उठा: हमारे पिता अमर हैं। उसे मारने वाला कोई जन्मा ही नहीं। उस पर अकालपुरूष (प्रभु) का हाथ है। उस वीर योद्धा को मारना असम्भव है। दूसरी बात रही, इस्लाम कबूल करने की, तो हमें सिक्खी जान से अधिक प्यारी है। दुनियाँ का कोई भी लालच व भय हमें सिक्खी से नहीं गिरा सकता। हम पिता गुरू गोबिन्द सिंघ के शेर बच्चे हैं तथा शेरों की भान्ति किसी से नहीं डरते। हम इस्लाम धर्म कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। तुमने जो करना हो, कर लेना। हमारे दादा श्री गुरू तेग बहादुर साहिब ने शहीद होना तो स्वीकार कर लिया परन्तु धर्म से विचलित नहीं हुए। हम उसी दादा जी के पोते हैं, हम जीते जी उनकी शान को आँच नहीं आने देंगे। सात वर्ष के जोरावर सिंघ तथा पाँच वर्ष के फतेह सिंघ के मुँह से बहादुरों वाले ये शब्द सुनकर सारे दरबार में चुप्पी छा गई। नवाब वज़ीर ख़ान भी बच्चों की बहादुरी से प्रभावित हुए बिना न रह सका। परन्तु उसने काज़ी को साहिबज़ादों के बारे में फतवा, सजा देने को कहा। काज़ी ने उत्तर दिया: कि बच्चों के बारे में फतवा, दण्ड नहीं सुनाया जा सकता। इस पर सुच्चानन्द बोला: इतनी अल्प आयु में ये राज दरबार में इतनी आग उगल सकते हैं तो बड़े होकर तो हकूमत को ही आग लगा देंगे। ये बच्चे नहीं, साँप हैं, सिर से पैर तक ज़हर से भरे हुए। एक गुरू गोबिन्द सिंघ ही बस में नहीं आते तो जब ये बड़े हो गये तो उससे भी दो कदम आगे बढ़ जायेंगे। साँप को पैदा होते ही मार देना चाहिए। देखो, इनका हौसला ! नवाब का अपमान करने से नहीं झिझके। इनका तो अभी से काम तमाम कर देना चाहिए। नवाब ने बाकी दरबारियों की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा कि कोई और सुच्चानन्द की बात का समर्थन करता है अथवा नहीं, परन्तु सभी दरबारी मूर्तिव्रत खड़े रहे। किसी ने भी सुच्चा नन्द की हाँ में हाँ नहीं मिलाई। तब वज़ीर ख़ान ने मालेरकोटले के नवाब से पूछा: ‘‘आपका क्या ख्याल है ? आपका भाई और भतीजा भी तो गुरू के हाथों चमकौर में मारे गये हैं। लो अब शुभ अवसर आ गया है बदला लेने का, इन बच्चों को मैं आपके हवाले करता हूँ। इन्हें मृत्युदण्ड देकर आप अपने भाई-भतीजे का बदला ले सकते हैं।’’
मालेरकोटले का नवाब पठान पुत्र था। उस शेर दिल पठान ने मासूम बच्चों से बदला लेने से साफ इन्कार कर दिया और उसने कहा: ‘‘इन बच्चों का क्या कसूर है ? यदि बदला लेना ही है तो इनके बाप से लेना चाहिए। मेरा भाई और भतीजा गुरू गोबिन्द सिंघ के साथ युद्ध करते हुए रणक्षेत्र में शहीद हुए हैं, कत्ल नहीं किये गये हैं। इन बच्चों को मारना मैं बुज़दिली समझता हूँ। अतः इन बेकसूर बच्चों को छोड़ दीजिए। मालेरकोटले का नवाब शेरमुहम्मद ख़ान चमकौर के युद्ध से वज़ीर ख़ान के साथ ही वापिस आया था और वह अभी सरहिन्द में ही था। नवाब पर सुच्चानन्द द्वारा बच्चों के लिए दी गई सलाह का प्रभाव तो पड़ा, पर वह बच्चों को मारने की बजाय इस्लाम में शामिल करने के हक में था। वह चाहता था कि इतिहास के पन्नों पर लिखा जाये कि गुरू गाबिन्द सिंघ के बच्चों ने सिक्ख धर्म से इस्लाम को अच्छा समझा और मुसलमान बन गए। अपनी इस इच्छा की पूर्ति हेतु उसने गुस्से पर नियँत्रण कर लिया तथा कहने लगा: बच्चों जाओ, अपनी दादी के पास। कल आकर मेरी बातों का सही-सही सोचकर उत्तर देना। दादी से भी सलाह कर लेना। हो सकता है तुम्हें प्यार करने वाली दादी तुम्हारी जान की रक्षा के लिए तुम्हारा इस्लाम में आना कबूल कर ले। बच्चे कुछ कहना चाहते थे परन्तु वज़ीद ख़ान शीघ्र ही उठकर एक तरफ हो गया और सिपाही बच्चों को दादी माँ की ओर लेकर चल दिए। बच्चों को पूर्ण सिक्खी स्वरूप में तथा चेहरों पर पूर्व की भाँति जलाल देखकर दादी ने सुख की साँस ली। अकालपुरख का दिल से धन्यवाद किया और बच्चों को बाहों में समेट लिया। काफी देर तक बच्चे दादी के आलिँगन में प्यार का आनन्द लेते रहे। दादी ने आँखें खोलीं कलाई ढीली की, तब तक सिपाही जा चुके थे। अब माता गुजरी जी आहिस्ता-आहिस्ता पोतों से कचहरी में हुए वार्तालाप के बारे में पूछने लगी। बच्चें भी दादी माँ को कचहरी में हुए वार्तालाप के बारे में बताने लगे। उन्होंने सुच्चानन्द की ओर से जलती पर तेल डालने के बारे भी दादी माँ को बताया। दादी माँ ने कहा, ‘‘शाबाश बच्चों ! तुमने अपने पिता तथा दादा की शान को कायम रखा है। कल फिर तुम्हें कचहरी में और अधिक लालच तथा डरावे दिये जाएँगे। देखना, आज की भाँति धर्म को जान से भी अधिक प्यारा समझना और ऐसे ही दृढ़ रहना। अगर कष्ट दिए जाएँ तो अकालपुरख का ध्यान करते हुए श्री गुरू तेग बहादुर साहिब और श्री गुरू अरजन देव साहिब जी की शहादत को सामने लाने का प्रयास करना।
भाई मतीदास, भाई सतीदास और भाई दयाला ने भी गुरू चरणों का ध्यान करते हुए मुस्कराते-मुस्कराते तन चिरवा लिया, पानी में उबलवा लिया और रूईं में लिपटवाकर जलकर शहीदी पायी थी। तुम्हारे विदा होने पर मैं भी तुम्हारे सिखी-सिदक की परिपक्वता के लिए गुरू चरणों में और अकालपुरख (परमात्मा) के समक्ष सिमरन में जुड़कर अरदास करती रहुँगी। यह कहते-कहते दादी माँ बच्चों को अपनी आलिँगन में लेकर सो गईं।
बाकी का इतिहास कल, कि कैसे छोटे छोटे साहिबज़ादों को तंग परेशान किया गया पर वह डोले नहीँ घबराए नहीँ …. आओ मिलकर उन छोटे छोटे साहिबज़ादोँ औऱ बुजुर्ग दादी माता जी को सीस झुकाए उनको प्रणाम करेँ
धन धन माता गुजर कौर जी
धन धन साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंघ जी
धन धन साहिबज़ादा फ़तेह सिंघ जी










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