पढ़ने से पहले… धीरे से अपनी आँखें बंद करें… अपने बाएँ नथुने (नोस्ट्रिल) से 10 गहरी साँसें लें… आराम करें… पढ़ना जारी रखें…
भय का दानव
एक बार पूर्णिमा के दिन, कृष्ण और बलराम जंगल में घूम रहे थे, देर हो चुकी थी और उन्होंने रात के लिए जंगल में आराम करने का फैसला किया। वह एक खतरनाक जंगल था, इसलिए कृष्ण ने सुझाव दिया, “बलराम, आप आधी रात तक जागते रहो, जब तक मैं सोता हूँ और मैं आधी रात से सुबह तक जागता रहूँगा।” वे दोनों मान गए और कृष्ण सो गए।
कुछ घंटे बीत गए, कृष्ण चैन की नींद सो रहे थे। बलराम ने दूर से एक गड़गड़ाहट सुनी, यह एक भयानक आवाज थी। वह आवाज की ओर थोड़ा और आगे बढे। अब उन्होंने देखा कि एक विशाल राक्षस उनके पास आ रहा है। राक्षस फिर से गुर्राया, बलराम बहुत भयभीत हो गए, वे भय से काँपने लगे। हर बार जब वह काँपने लगते तो राक्षस आकार में दोगुना हो जाता। बलराम के पास पहुँचते- पहुँचते राक्षस बड़ा और बड़ा हो गया। अब राक्षस, बलराम के बहुत पास खड़ा था, वह फिर से गुर्राने लगा। राक्षस की आवाज, आकार और भयानक गंध से भयभीत बलराम चिल्लाये “कृष्ण! कृष्ण!” और फिर वे गिर कर बेहोश हो गये।
पुकार से उठे कृष्ण, ध्वनि का पीछा करते हुए वहाँ पहुँचे और बलराम को वहाँ जमीन पर सोते हुए पाया, कृष्ण ने सोचा, ‘अब पहरे की मेरी बारी आ गई होगी’ और वे टहलने लगे। धीरे-धीरे कृष्ण को पास खड़े राक्षस का अहसास हो गया।
राक्षस कृष्ण पर गुर्राया। “आप क्या चाहते हैं?” कृष्ण ने निडर होकर पूछा। राक्षस का आकार छोटा हो गया, वह अपने आकार से आधा हो गया। “आप यहाँ पर क्या कर रहे हैं?” कृष्ण ने पूछा। अब राक्षस सिर्फ 2 इंच लंबा रह गया और वह बहुत प्यारा और मनमोहक लग रहा था। कृष्ण ने उसे अपने हाथ में लिया और अपनी जेब में रख लिया। रात बीत गई और सुबह बलराम जाग गए।
बलराम ने कृष्ण को देखा और खुशी से चिल्लाये “कृष्ण! कृष्ण!”।
“कृष्ण! आप नहीं जानते कि जब आप सो रहे थे तो क्या भयानक बात हुई। हम दोनों को मारने की कोशिश करने के लिए यहाँ एक बड़ा राक्षस आया था। मुझे नहीं पता कि हम कैसे बच गए, आखिरी बात मुझे याद है कि मैं बेहोश हो गया था।” बलराम ने कल रात की घटनाओं को याद करने की कोशिश करते हुए कहा।
कृष्ण ने छोटे राक्षस को अपनी जेब से निकाला और कहा, “क्या यह वही राक्षस है?”
“हाँ, लेकिन यह तो बहुत बड़ा था! यह इतना कैसे सिकुड़ गया?” बलराम ने पूछा।
“हर बार जब मैंने इससे सवाल किया, तो यह आकार में सिकुड़ता गया और आखिरकार यह इस आकर में आ गया।”
बलराम ने कृष्ण को बताया कि कैसे राक्षस कल हर बार उसे डरा रहा था।
तब कृष्ण ने निष्कर्ष निकाला “हर बार जब हम डरते हैं तो हमारे डर और बड़े हो जाते हैं, लेकिन जब हम उनका सामना करते हैं और उनसे सवाल करते हैं, तो वे छोटे और छोटे होते जाते हैं।”
“साहस, डर नहीं लगने में नहीं है, डर पर काबू पाने में सक्षम होना ही असली साहस है।”
चारीजी









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