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परीक्षा
आश्रम में शिष्यों की शिक्षा का अंतिम दिवस था। आज उनकी अंतिम परीक्षा थी। इसमें सफल होने पर वे अपने घर वापस जा सकते थे अन्यथा असफल होने पर आश्रम में पुनः रहकर शिक्षा प्राप्त करते।
आचार्य जी ने सभी शिष्यों को बांस की टोकरी दी और कहा पास कि,”नदी से इसमें जल भर के लाओ और पौधों को सींचो।”
कुछ शिष्यों ने सोचा कि आचार्य जी यह कैसी परीक्षा ले रहे हैं। बांस की टोकरी में तो पानी आ ही नहीं सकता। फिर भी आचार्य जी की आज्ञा का पालन करने सभी लोग अपनी-अपनी टोकरी लेकर नदी पर गए और जल भरने लगे। जैसे ही वे टोकरी में जल भरकर ऊपर लाते, सारा जल टोकरी के छिद्रों से बाहर बह जाता।
कुछ शिष्यों ने तो एक दो बार में ही कहा, “यह नहीं हो सकता” और वापस आ गए। कुछ थोड़ी देर तक प्रयास करते रहे। कुछ जल भरकर लाये तो रास्ते में ही जल बह गया। उन्होंने टोकरी वहीं फेंक दी।
इनमें से तीन शिष्य ऐसे थे जिन्हें गुरु की बात पर विश्वास था। तीनों बांस की टोकरी को बार-बार भरते रहे और निकालते रहे। लगभग घंटे भर बाद उन्होंने देखा कि बांस की टोकरी में पानी भरने पर वह नीचे नहीं गिर रहा है क्योंकि इतने देर में टोकरी पानी से भीग गई थी और बांस फूलकर आपस में एक दूसरे से चिपक गए थे जिससे छिद्र बंद हो गए थे। तीनों जल से भरी हुई बांस की टोकरी लेकर आश्रम आए और पौधों को सींचा।
आचार्य जी ने परीक्षा परिणाम घोषित किया जिसमें यह तीनों शिष्य ही सफल हुए । बाकी शिष्यों को आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए आश्रम में ही रुकना था।
आचार्यजी ने सभी को बताया कि, “हमारे जीवन में गुरु पर विश्वास, अभ्यास और धैर्य होना बहुत आवश्यक है। इसलिए मैंने यह परीक्षा तुम लोगों से ली। आप सब देखिए इन तीनों में मेरे कथन पर विश्वास था। यह बिना थके निरंतर टोकरी में जल भरने का कार्य करते रहे। इन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा। अंत तक धैर्य बनाकर प्रतीक्षा की और विश्वास, अभ्यास तथा धैर्य से आज सफल हुए।”
सभी शिष्य अपनी असफलता का कारण समझ चुके थे।
*"श्रद्धा आध्यात्मिकता के महल की नींव है। सत्य में श्रद्धा, साक्षात्कार के लिए अपनाए उचित मार्ग में श्रद्धा, उस योग्य गुरु में श्रद्धा जिसकी शरण में गए हैं - वह चट्टान है जिस पर हमें आध्यात्मिकता का महल बनाना चाहिए यदि हम वास्तव में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं।"*
बाबूजी









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