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मानवता

पढ़ने से पहले…धीरे से अपनी आँखें बंद करें…चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान ले आए।

मानवता

एक आदमी बर्फ बनाने वाली कम्पनी में काम करता था।

एक दिन कारखाना बन्द होने से पहले वह अकेला बर्फ जमाने वाले कमरे का चक्कर लगाने गया तो गलती से दरवाजा बंद हो गया और वह कमरे के अंदर बर्फ वाले हिस्से में फंस गया।

छुट्टी का वक़्त था और सब काम करने वाले लोग घर जा रहे थे। किसी ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया कि कोई अंदर फंस गया है।

वह समझ गया कि दो-तीन घंटे बाद उसका शरीर बर्फ बन जाएगा। अब जब मौत सामने नजर आने लगी तो वह भगवान को सच्चे मन से याद करने लगा।

वह अपने कर्मो की क्षमा मांगने लगा और भगवान से प्रार्थना करी, “प्रभु अगर मैंने जिंदगी में कोई एक काम भी मानवता व धर्म का किया है तो आप मुझे यहाँ से बाहर निकालो। मेरे बीवी बच्चे मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। उनका पेट पालने वाला इस दुनिया में सिर्फ मैं ही हूँ। मैं पूरे जीवन आपके इस उपकार को याद रखूँगा।” और इतना कहते कहते उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे।

एक घंटा ही गुजरा था कि अचानक फ़्रीजर रूम में खट-खट की आवाज हुई, दरवाजा खुला, चौकीदार भागता हुआ आया और उस आदमी को उठाकर बाहर निकाला और गर्म हीटर के पास ले गया।

उसकी हालत कुछ देर बाद ठीक हुई तो उसने चौकीदार से पूछा, “आप अंदर कैसे आए?”

चौकीदार बोला कि साहब मैं 20 साल से यहाँ काम कर रहा हूँ। इस कारखाने में काम करते हुए हर रोज सैकड़ों मजदूर और ऑफिसर कारखाने में आते जाते हैं। लेकिन आप उन कुछ लोगों में से हो, जो जब भी कारखाने में आते हो तो मुझसे हँस कर राम राम करते हो और हालचाल पूछते हो और निकलते हुए आपका राम राम काका कहना मेरी सारे दिन की थकावट दूर कर देता है, जबकि अक्सर लोग मेरे पास से यूँ गुजर जाते हैं कि जैसे मैं कुछ हूँ ही नहीं।

आज हर दिन की तरह मैंने आपका हँस कर आते हुए अभिवादन तो सुना लेकिन राम राम काका सुनने के लिए इंतज़ार करता रहा। जब ज्यादा देर हो गई तो मैं आपको तलाश करने चल पड़ा कि कहीं आप किसी मुश्किल में ना फंसे हो।

वह आदमी हैरान हो गया कि किसी को हँस कर राम राम कहने जैसे छोटे काम की वजह से आज उसकी जान बच गई।

मीठे बोल बोलो, संवर जाओगे, सब की अपनी जिंदगी है, यहाँ कोई किसी का नहीं खाता है। जो दोगे औरों को, वही वापस लौट कर आता है।

      *"जैसे-जैसे हम 'अपनेपन' का भाव विकसित करते जाते हैं और अपनी मालिकाना हक जमाने की आदत छोड़ते जाते हैं, हमारे देने का दायरा लगातार तब तक बढ़ता जाता है जब तक अन्ततः हमारे हृदय उदारता के स्रोत नहीं बन जाते जो फिर सभी जरूरतमंदों को देते रहते हैं।"*

दाजी

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