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हमारा नजरिया, हमारा भविष्य

पढ़ने से पहले… धीरे से अपनी आँखें बंद करें… गहरी साँस लें… और फिर पढ़ना जारी रखें

हमारा नजरिया, हमारा भविष्य

एक शिक्षिका एक बार पूरी कक्षा के बच्चों को अपने गाँव लेकर गईं। उनके परिवार वालों ने गाँव में आम के बाग लगा रखे थे। साथ ही एक पौधशाला भी थी, जहाँ गुलाब की खेती होती थी। सारे बच्चों ने बाग से तोड़कर बढ़िया आम खाए और फिर गुलाबों के बीच खड़े होकर ढेर सारी फोटो खिंचवाई।

शिक्षिका सभी बच्चों को साथ में मिलकर खेलता देख काफ़ी प्रसन्न हो रही थीं। उन्होंने छात्रों को भी सीख देनी चाही। अतः जब वहाँ से चलने का समय आया और सब एक जगह एकत्रित हो गए, शिक्षिका ने कहा, “बच्चों, हमारी ज़िंदगी में अच्छे लोग और अच्छे रिश्ते होने बहुत ज़रूरी होता है। हमें इनकी अहमियत समझनी चाहिए।”

एक बच्चे ने पूछा, “लेकिन हम यह कैसे पता लगाएँ कि कौन अच्छा है और कौन बुरा?”

शिक्षिका कहने लगी, “चलो इसे हम एक खेल के ज़रिये समझते हैं। तुम ज़रा आम के बाग में जाओ और वहाँ जो भी सबसे बड़ा आम हो, वह मेरे लिए तोड़कर ले आओ। लेकिन यदि तुम एक बार आगे बढ़ गए, तो पीछे लौट नहीं सकते।” वह बच्चा बाग में गया और वहाँ सारे आमों को ध्यान से देखने लगा। एक-एक आम को देखते हुए वह यह सोचकर आगे बढ़ता गया कि शायद इससे बड़ा आम आगे दिख जाए।

ऐसा करते-करते वह बाग के अंत तक पहुँच गया। आखिरी सिरे पर पहुँचने के बाद उसे यह समझ में आया कि सबसे बड़ा आम तो पहले ही पेड़ पर लगा था। वह खाली हाथ शिक्षिका के पास पहुँचा और अपना अनुभव सुनाया। शिक्षिका बोली, “हम अक्सर ऐसे ही लोगों को समझने में भूल कर देते हैं। अच्छे की तलाश में हम इधर-उधर ढूँढते रहते हैं, और जो हमारे सामने है, हम उसकी अच्छाइयों को भी नहीं पहचान पाते।”

“अच्छा चलो, अब मेरे लिए सबसे बड़ा गुलाब तोड़कर ले आओ।” इस बार बच्चे ने कोई गलती नहीं की। वह गुलाब के बाग में गया और उसे सबसे पहला गुलाब जो सबसे बड़ा दिखा, उसे तोड़कर ले आया। शिक्षिका कहने लगी, “देखा, इस बार तुमने अपने ऊपर विश्वास किया और खुद को यकीन दिलाया कि जो मेरे सामने है, वही सबसे अच्छा है। अच्छाई अक्सर दूसरों में नहीं, बल्कि अपने ही अंदर छिपी रहती है।”

ज़्यादा अच्छे की लालच में उसे ना खो दें जो आपके सामने है, हम अक्सर ऐसे ही लोगों को समझने में भूल कर देते हैं। अच्छे की तलाश में हम इधर-उधर ढूँढते रहते हैं, और जो हमारे सामने है, हम उसे भी नहीं पहचान पाते। हमारी सोच और नज़रिया ही हमारा भविष्य तय करती हैं।

जब तक हमारे अंदर की अच्छाई जिंदा है, तब तक हम इसे दूसरों में भी ढूँढ पाएँगे।

  *"पूर्णता की तलाश अपने अंदर करें न कि बाहर।"*

दाजी

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