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पिता का श्राद्ध

. पिता का श्राद्ध

गुरू नानक देव जी रावी नदी के किनारे बैठे थे। वहा पर सेठ दुनीचंद आया। गुरू नानक जी के दर्शन करके मन मोहित हो गया। पूछा ये कौन हैं। भाई मर्दाना जी बोले ये श्री गुरू नानक देव जी हैं। सेठ बोला आप मेरे घर भोजन करने आ सकते है? आज हमारे पिता का श्राद्ध है। गुरू नानक जी बोले ठीक है अपना पता बता दो, आ जाएंगे। मर्दाना जी बड़े हैरान हुए, ये तो किसी के भोजन खाते नहीं, आज कैसे मान गए। सेठ दुनीचंद ने कहा महाराज मेरा पता किसी से पूछ लीजिए। यहां सबसे अमीर मैं ही तो हूं। यहां नगर में एक लाख मोर हो किसी के पास तो अपने घर के आगे एक झंडा लगा देता है। मेरे पास बारह लाख मोर है बारह झंडे लगे हैं। किसी से पूछ लेना सेठ दुनीचंद का घर कहां पर है। आज वहां बहुत बड़ा लंगर है आ कर खाना जरूर खाना।

गुरू नानक देव जी ने तो उसका कल्याण करना था। मर्दाना जी से कहा चल मर्दाना आज इसका कल्याण करते हैं। गुरू नानक देव जी सेठ के घर आए। यहां कतारें(लाइनें) लगी हैं। नगर के वासी लंगर भोजन कर रहे है। 100 ब्राह्मण भी एक तरफ बैठे भोजन कर रहे हैं। गुरू नानक देव जी भी जाकर बैठ गए। सेठ ने कहा आओ आप भी यहां बैठ जाओ। गुरू नानक देव जी ने कहा पहले सबको खिला दो। सेठ कहने लगा आप तो बड़े संतोषी हो, सबर वाले हो। नहीं तो यहां लंगर बंटना शुरू होता है तो लोग एक दूसरे पर टूट पड़ते हैं।

गुरू नानक देव जी ने पूछा सेठ ये लंगर किस लिए लगाया है। सेठ कहने लगा महाराज ये अपने पिता पितरों के कल्याण के लिए लगाया है। आज मेरे पिताजी की बरसी है। गुरू नानक देव जी ने पूछा तो क्या पिताजी का कल्याण हो गया? सेठ ने कहा हां महाराज, 100 ब्राह्मण खा कर चले गए। सुबह से पता नहीं कितने लोग लंगर करके चले गए और अभी भी लंगर चल रहा है। सबने यही कहा तेरे पिता का कल्याण हो।

गुरू नानक जी कहने लगे अभी तेरे पिता का कल्याण नहीं हुआ है। वो तो बाघ की योनि में जंगल की झाड़ी में 3 दिनों से भूखा बैठा है। ये बात सुन के सेठ हैरान हो गया। गुरू नानक देव जी ने कहा ये जो तूने मेरे लिए थाली लगाई है इसे ले जा। वहां नदी के उस तरफ झाड़ी में तेरा पिता बैठा है बाघ बन कर। मेरी थाली ले जा। हमने अपनी दया दृष्टि डाल दी है इस थाल में अब ये प्रसाद बन गया है।

सेठ को विश्वास नहीं हुआ इतने सालो से श्राद्ध कर रहे हैं किसी ने कुछ नहीं कहा। इन्होंने तो नई बात कह दी। सेठ दुनीचंद कहने लगा महाराज वो तो बाघ है। कहीं मेरे को ना खा जाए। गुरू नानक जी ने कहा नहीं खायेगा तेरे को। तू मेरा दर्शन करके जा रहा है। वो जब तेरा दर्शन करेगा निहाल हो जाएगा। वो तेरा पिता है ये उसे ज्ञान हो जाएगा। जा दुनीचंद जब तक तू लौट के नहीं आयेगा, हम तेरे इंतज़ार में यही बैठे रहेंगे। सेठ चल पड़ा कभी दो कदम आगे कभी दो कदम पीछे। मन कभी मानता, कभी नहीं मानता पर नाव में बैठ के नदी के उस तरफ गया जहा गुरू नानक जी ने कहा था। झाड़ियों के पीछे वो तेरा बाप है तू उसका पुत्र है। जब झाड़ियों के पीछे गया तो वहा बाघ दिख गया और जब झाड़ी खड़कने की आवाज हुई तो बाघ ने दुनीचंद की तरफ मुंह ऊपर किया तो सेठ को लगा मेरा बाप भी मेरे को ऐसे ही देखता था। उसकी आंख भी ऐसी लगती थी। जाकर प्रसाद का थाल आगे रखा और कहा बापू भूख है ना तेरे लिए गुरूजी ने प्रसाद भेजा है और जैसे ही उसके हाथ से प्रसाद खाया वो बाघ के रूप में कहने लगा दुनीचंद जल्दी जा तेरे घर परमात्मा रूप नारायण आए हैं। उनकी कृपा से मेरा कल्याण हुआ। तु जा उनके चरण पकड़ कही वो चले ना जाए।

“पता है मैं इस योनि में क्यू आया? मेरे अंतिम समय में पड़ोस में मांस बन रहा था। मांस की गंध मेरे पास आई। अंत समय में मुझे लगा थोड़ा मुझे भी मिल जाय तो मैं भी खा लूं। इसलिए मुझे भगवान ने बाघ की योनि दी है ताकि अब जितना मर्जी मांस खा। क्योंकि अंत समय में जैसा मन में ख्याल आ जाए, नारायण उसी तरफ भेज देता है।” अंत समय नारायण याद आ जाए तो नारायण खुद लेने आ जाए।

सेठ जब घर आया तो गुरू नानक जी के चरणों में गिर पड़ा। कहने लगा सतगुरु जी आपने सच कहा आज मेरे पिता का कल्याण हुआ है।
………..”GOD is LOVE”

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