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ईश्वरीय कृपा

पढ़ने से पहले प्यार से अपनी आँखें बंद करें…दिन भर में हमें जो कुछ भी मिला है उसके लिए कृतज्ञता महसूस करें… मुस्कुराएँ… धीरे से आँखें खोलें और पढ़ना शुरू करें…

ईश्वरीय कृपा

एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में, एक वृद्ध किसान अपने इकलौते पुत्र के साथ रहता था। स्वामित्व के नाम पर उसके पास गाँव में एक छोटा सा खेत का टुकड़ा, एक गाय और एक घोड़ा था।

एक दिन उसका घोड़ा कहीं भाग गया। उन लोगों ने घोड़े को ढूँढने की बहुत कोशिश की पर घोड़ा नहीं मिला। किसान का पुत्र बहुत दुखी हो गया। वृद्ध किसान के पड़ोसी उसको सांत्वना देने आये और कहा, “ईश्वर आपके प्रति बहुत निष्ठुर है, आपके साथ बहुत बुरा हुआ।”

किसान ने शांत भाव से उत्तर दिया, “यह निश्चित रूप से ईश्वरीय कृपा है।”

दो दिनों बाद घोड़ा वापस आ गया, लेकिन अकेला नहीं। चार अच्छे शक्तिशाली जंगली घोड़े भी उसके पीछे-पीछे आये। इस तरह से उस वृद्ध किसान के पास अब पाँच घोड़े हो गए।

लोगों ने कहा, “बहुत खूब! तुम तो बहुत भाग्यशाली हो।” बहुत ही सम भाव से कृतज्ञ होते हुए वृद्ध किसान ने कहा, “निश्चित रूप से यह भी ईश्वरीय कृपा है।”

उसका पुत्र बहुत उत्साहित हुआ। दूसरे ही दिन उसने एक जंगली घोड़े को जाँचने के लिए उसकी सवारी की, किन्तु वो घोड़े से गिर गया और उसका पैर टूट गया।

पड़ोसियों ने अपनी समझ दिखाते हुए कहा, “यह घोड़े अच्छे नहीं हैं। यह आपके लिए दुर्भाग्य लाये हैं, इसलिए आपके पुत्र का पाँव टूट गया।”

किसान ने उत्तर दिया, “यह भी उस ईश्वर की ही कृपा है।”

कुछ दिनों बाद राज्य पर पड़ोसी राजा ने आक्रमण कर दिया। राजा के सैनिक सभी जवान युवकों को जबर्दस्ती सेना में भर्ती करने हेतु गाँव-गाँव में घूमने लगे। वे इस गाँव में भी आये और गाँव के सारे नवयुवकों को ले गए लेकिन टूटे पैर के कारण किसान के पुत्र को छोड़ गए।

कुढ़न और ऊपरी स्नेह से गाँव वालों ने किसान को बधाई दी कि उसका पुत्र जाने से बच गया। किसान ने कहा, “निश्चित रूप से यह भी उस ईश्वर की ही कृपा है।”

आइए हम कहानी पर विचार करें।

क्या हम अपने जीवन में हर स्थिति का अवलोकन करते हैं या आलोचना ?

हम मनुष्य ही अपने मन में मिथ्या सोच और भ्रम में पड़कर हमेशा किस्मत को दोष देते हैं कि हम तो इतना भजन करते हैं, सेवा करते हैं, फिर भी ईश्वर हमारे साथ ऐसा बुरा करते हैं। वास्तव में हमारे जीवन में जो कुछ भी होता है वो हमारे कर्मों के हिसाब से होता है, अच्छा और बुरा तो उसे केवल हमारी सोच बनाती है।

“सबसे सुखी इंसान वह है जो हर परिस्थिति में ख़ुश रहता है।”

        *“स्वीकार्यता क्रमिक-विकास की सूचक है। हमारी तैयारी या मनोभाव यह होना चाहिए कि चाहे जो भी हो, मैं उसका सामना करने के लिए तैयार हूँ।”*

दाजी

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