Jan Media TV

Inform Engage Inspire

Advertisement

छोटी गौरैया का विश्वास

छोटी गौरैया का विश्वास

एक कथा के अनुसार कुरुक्षेत्र के युद्ध क्षेत्र को, विशाल सेनाओं के आवागमन की सुविधा के लिए तैयार किया जा रहा था। हाथियों का इस्तेमाल पेड़ों को उखाड़ने और जमीन साफ करने के लिए किया जा रहा था। ऐसे ही एक पेड़ पर एक गौरैया अपने चार बच्चों के साथ रहती थी। जब उस पेड़ को उखाड़ा जा रहा था तो उसका घोंसला जमीन पर गिर गया, लेकिन चमत्कारी रूप से उसकी संताने उस अनहोनी दुर्घटना से बच गई। लेकिन वे अभी बहुत छोटे होने के कारण उड़ने में असमर्थ थे। कमजोर और भयभीत गौरैया मदद के लिए इधर-उधर देखती रही। तभी उसने कृष्ण को अर्जुन के साथ वहाँ आते देखा। वे युद्ध के मैदान की जाँच करने और युद्ध की शुरुआत से पहले जीतने की रणनीति तैयार करने के लिए वहाँ आये थे।

उस गौरैया ने कृष्ण के रथ तक पहुँचने के लिए अपने छोटे पंख फड़फड़ाए और किसी प्रकार श्री कृष्ण के पास पहुँची और बोली, “हे कृष्ण, कृपया मेरे बच्चों को बचा लो क्योकि लड़ाई शुरू होने पर कल उन्हें कुचल दिया जायेगा।”

सर्वव्यापी भगवान बोले, “मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूँ, लेकिन मैं प्रकृति के कानून में हस्तक्षेप नहीं कर सकता!”

गौरैया ने कहा “हे भगवान ! मैं जानती हूँ कि आप मेरे उद्धारकर्ता हैं, मैं अपने बच्चों के भाग्य को आपके हाथों में सौंपती हूँ। अब यह आपके ऊपर है कि आप उन्हें मारते हैं या उन्हें बचाते हैं।”

“काल चक्र पर किसी का बस नहीं है।” श्री कृष्ण ने एक साधारण व्यक्ति की तरह उस गौरैया से बात करी, जिसका आशय था कि इस बारे में वे कुछ भी नहीं कर सकते।

गौरैया ने विश्वास और श्रद्धा के साथ कहा, “प्रभु, आप कैसे और क्या करते है वह मैं नहीं जानती। आप स्वयं काल के नियंता हैं, यह मुझे पता है। मैं सारी स्थिति एवं परिस्थति सहित स्वयं को परिवार सहित आपको समर्पण करती हूँ, बस!”

श्री कृष्ण उस गौरैया से इतना सा बोले, “अपने घोंसले में तीन सप्ताह के लिए भोजन का संग्रह कर लो।”

गौरैया और श्री कृष्ण के संवाद से अनभिज्ञ अर्जुन, गौरैया को दूर भगाने की कोशिश करते रहे।

गौरैया ने अपने पंखों को कुछ मिनटों के लिए फैलाया और फिर अपने घोंसले में वापस चली गई।

दो दिन बाद, शंख के उदघोष से युद्ध शुरू होने की घोषणा की गई। कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि “अपने धनुष और बाण मुझे दो।” अर्जुन चौंके क्योंकि कृष्ण ने युद्ध में कोई भी हथियार नहीं उठाने की शपथ ली थी। इसके अतिरिक्त, अर्जुन का मानना था कि वह ही सबसे अच्छा धनुर्धर है।

“मुझे आज्ञा दें भगवान,” अर्जुन ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा, “मेरे तीरों के लिए कुछ भी अभेद्य नहीं है।” कृष्ण ने चुपचाप अर्जुन से धनुष लेकर एक हाथी को निशाना बनाया। लेकिन, हाथी को मार कर नीचे गिराने के बजाय तीर, हाथी के गले की घंटी में जा टकराया और एक चिंगारी सी उड़ी। अर्जुन यह देख कर अपनी हँसी नहीं रोक पाए कि कृष्ण एक आसान सा निशान चूक गए।

“क्या मैं प्रयास करू?” अर्जुन ने स्वयं को प्रस्तुत किया। उसकी प्रतिक्रिया को नजरअंदाज करते हुए, कृष्ण ने उसे धनुष वापस दिया और कहा कि, “कोई अब और कार्यवाही की आवश्यकता नहीं है।”

“लेकिन केशव आपने हाथी को तीर क्यों मारा?” अर्जुन ने पूछा।
“क्योंकि इस हाथी ने उस गौरैया के आश्रय, उस घोंसले को, जो कि एक पेड़ पर था, उसे गिरा दिया था।”

“कौन सी गौरैया?” अर्जुन ने पूछा।
“इसके अतिरिक्त, हाथी तो अभी स्वस्थ और जीवित है। केवल घंटी ही टूट कर गिरी है!” अर्जुन के सवालों को अनदेखा करते हुए कृष्ण ने उसे शंख फूंकने का निर्देश दिया। युद्ध शुरू हुआ, अगले अठारह दिनों में कई जानें चली गई। अंत में पांडवों की जीत हुई।

एक बार फिर, कृष्ण अर्जुन को अपने साथ युद्ध क्षेत्र में भ्रमण करने के लिए ले गए। कई शव अभी भी वहाँ हैं जो उनके अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहे हैं। जंग का मैदान गंभीर अंगों और सिर, बेजान शरीरों और मृत हाथियों से अटा पड़ा था। कृष्ण एक निश्चित स्थान पर रुके और एक घंटी जो कि हाथी पर बाँधी जाती थी, उसे देख कर विचार करने लगे,”अर्जुन” उन्होंने कहा, “क्या तुम मेरे लिए यह घंटी उठाकर एक तरफ रख दोगे?” निर्देश बिलकुल सरल था परन्तु अर्जुन के समझ में नहीं आया। आख़िरकार विशाल मैदान में जहाँ बहुत सी अन्य चीज़ों को साफ़ करने की ज़रूरत थी, कृष्ण उसे धातु के एक टुकड़े को रास्ते से हटाने के लिए क्यों कहेंगे? उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा।

“हाँ, यह घंटी,” कृष्ण ने दोहराया। “यह वही घंटी है जो उस हाथी की गर्दन पर थी जिस पर मैंने तीर मारा था।” अर्जुन बिना किसी और सवाल के भारी घंटी उठाने के लिए नीचे झुका। जैसे ही उन्होंने इसे उठाया उसकी जैसे दुनिया हमेशा के लिए बदल गई। एक, दो, तीन, चार और पाँच। चार युवा पक्षियों और उसके बाद एक गौरैया उस घंटी के नीचे से बाहर निकले । बाहर निकल कर माँ और छोटे पक्षी कृष्ण के इर्द-गिर्द मंडराने लगे एवं बड़े आनंद से उनकी परिक्रमा करने लगे। अठारह दिन पहले काटी गई एक घंटी ने पूरे परिवार की रक्षा की थी।

“मुझे क्षमा करें हे कृष्ण” अर्जुन ने कहा,”आपको मानव शरीर में देखकर और सामान्य मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हुए, मैं भूल गया था कि आप वास्तव में कौन हैं।”

हमारा विश्वास कितना दृढ़ है?

       *“आस्था अस्तित्व की नींव है। बिना आस्था के हमारा अस्तित्व एक ऐसे नींव रहित भवन जैसा होगा जो हवा के हर झोंके और आँधी की दया पर निर्भर होता है।”*

चारीजी  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *