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क्या हम बहुत अधिक सोचते हैं?

क्या हम बहुत अधिक सोचते हैं?

क्या हम बहुत अधिक सोचते हैं?

बहुत अधिक सोचना (Overthinking)

मदुरई के पास एक पराक्रमी राजा रहता था। जनता भी राजा से बहुत प्यार करती थी। राजा का एक बेटा भी था। जो पिता की तरह नाम कमाना चाहता था। वह भी पिता जैसा महान बनना चाहता था। लेकिन राजकुमार से कई गलतियाँ होती रहती और राजकुमार हमेशा चिंता में रहता कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे?

इसी राज्य में एक मंत्री रहता था जो काफी समझदार था और उसके कई सारे शिष्य भी थे। एक दिन राजकुमार परेशान हो कर राज्य के मंत्री के पास गया और बोला, “मैं अकसर परेशान रहता हूँ। मुझे अपने मन को नियमित करना सीखना है, क्या आप मुझे सिखाएंगे?”

मंत्री ने राजकुमार की तरफ देखा और प्रश्न किया, “पर राजकुमार क्या तुम इसकी कीमत चुका पाओगे?”

राजकुमार ने बड़े अभिमान से कहा, “आप इसकी तनिक भी चिंता मत करिए। आखिर मैं राजकुमार हूँ इस नगर का, मेरे पास धन की कोई कमी नहीं है।” उसकी बात सुनकर मंत्री ने कहा, “नहीं नही तुमने गलत समझा, मैं तुमसे कुछ कार्य करने को कहूँगा, वे कार्य तुमको बिना सवाल पूछे पूरे करने है?”

राजकुमार ने कहा कि आप जैसा कहेंगे मैं वैसा करने के लिए तैयार हूँ। तब मंत्री ने कहा, “तुम अकेले पैदल बाज़ार जाओ और कबाड़ की दुकान से कुछ लोहा खरीद कर लाओ।” राजकुमार जो बिना रथ के कभी महल से बाहर नहीं गया, जिसके इशारे पर नौकर दौड़ते, उसने कहा, “क्या मैं इस काम के लिए अपने नौकर को भेज सकता हूँ?”

मंत्री ने कहा, “नही, अगर तुम्हे सीखना है तो तुम्हे मैं जो कहूँ वह बिना सवाल करना होगा।” मंत्री ने फिर कहा-“शहर के उत्तरी कोने में जो सबसे बड़ा बाज़ार है उसके आखिरी छोर पर कबाडियों की दुकान लगती है। वहाँ तुम पैदल जाओ और कुछ लोहा खरीद कर लाओ।”

राजकुमार ने कुछ सोचा फिर बाज़ार की तरफ निकल पड़ा। फिर जैसे ही बाज़ार में घुसा तो उसके मन में विचारो के तूफान उठने लगे कि “लोगो ने मेरे कपड़ों से तो मुझे पहचान लिया होगा”, “सब मुझे देख रहे होंगे”, “और मेरे पीछे बातें होंगी कि राजकुमार को क्या हुआ?”,”शायद सजा मिली है!”,”राजा नाराज है!”,”ऐसा काम राजकुमार को शोभा नहीं देता!” यह सब बाते सोचकर, उसका सर शर्म से झुक गया। राजकुमार संकोच करते हुए, बाज़ार को पार करते हुए एक कबाड़ की दुकान पर पहुँचा और जल्दी से लोहा खरीदा। लोहे पर काफी धूल मिट्टी लगी थी। लेकिन राजकुमार का ध्यान तो चिंता में लगा हुआ था। जिसकी वजह से राजकुमार के कपड़े भी गंदे हो गए। अब राजकुमार परेशान हो गया, खुदको कोसने लगा। फिर जल्दी-जल्दी मंत्री के पास लौटा।

मंत्री ने राजकुमार की हालत देखी और कहा अब अगला काम करो। तुम वापस शहर जाओ। शहर के दूसरी तरफ कोयलो की एक भट्टी है। वहाँ इस लोहे को पिघलाकर इसका नया बर्तन बनाकर लाओ।

राजकुमार बिना इच्छा के दोबारा शहर की ओर चल दिया। मन ही मन विचार चलते रहे, “लोग क्या सोच रहे होंगे! पिता जी को पता चला तो क्या होंगा? मैं ऐसे चक्कर में क्यों फस जाता हूँ।” ऐसा सोचते-सोचते राजकुमार भट्टी वाले के पास पहुँचा और उसके साथ मिलकर बर्तन बनाया। उसने पहली बार ये काम किया था। राजकुमार को अंदर से खुशी हुई। फिर वह बर्तन दिखाने मंत्री के पास चल दिया। इस बार राजकुमार की चाल में कुछ फुर्ती थी।

बर्तन को देखकर मंत्री ने कहा, “युवराज इस समय तुम कुछ अच्छा महसूस कर रहे होंगे। यह तुम्हारे अहंकार का बर्तन है।”

राजकुमार कुछ समझा नहीं। मंत्री ने आगे कहा, “ठीक है! अब तुम आखिरी काम करो। फिर मैं तुम्हे राज बताता हूँ।”

मंत्री ने राजकुमार से कहा, “तुम वापस बाज़ार जाओ और आस पास के लोगों से पूछो की क्या तुमने मुझे यहाँ थोडी देर पहले देखा? और तुमने मुझे देखा तब तुमने मेरे बारे में क्या सोचा?”

राजकुमार ने बाज़ार में सबसे पहली दुकान पर जाकर पूछा कि मैं सुबह यहाँ से निकला क्या तुमने मुझे देखा था?

तो दुकानदार ने कहा, “हाँ देखा तो था लेकिन मेरे पास सोचने का समय नहीं था। सुबह का समय काफी व्यस्त होता है और खरीददार भी आते है।” उसी तरह राजकुमार ने कुछ और लोगों से पूछा तो पता चला किसी ने भी राजकुमार या उसकी घबराहट पर ध्यान नहीं दिया था। राजकुमार ने फिर कबाड़ वाले से भी पूछा तो उसने कहा, “मैं समझ तो रहा था कि तुम किसी बडे़ घर के लड़के हो लेकिन भाई इससे ज्यादा मैने सोचा नहीं।”

लोगो की बात सुन कर राजकुमार को ऐसा लगा कि किसी ने सीने से बोझ उठा लिया हो। सालो के आत्मआलोचना (self criticism) से उसे आराम मिला। वह तुरंत मंत्री के पास गया और सारा किस्सा सुनाया।

तब मंत्री ने कहा, “हम खुद अपनी कमियों को, अपनी गलतियों को जितना करीब से देखते है उतना कोई नहीं देखता। हम लोग खुद सबसे बड़े आलोचक (critic) है और बार-बार सोच कर हम अपनी गलतियों को अपने दिमाग में बड़ा बना लेते है।”

हम यह भी गणना (calculate) करते रहते है कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोच रहे होंगे? काश मैंने उसके सामने ऐसा नहीं बोला होता। इस वजह से बहुत ज्यादा सोचने (overthinking) में फँस जाते है।

आखिर में मंत्री जी ने कहा, ” जब भी विचार चक्रव्यूह में फंसो, विचारो को शांत नहीं कर पाओ तो इनसे लड़ने की जगह, अपना मन किसी रचनात्मक काम में लगाओ। कुछ न कुछ ऐसा काम जहाँ तुम सब कुछ भूल कर अपने हाथो से उस काम में लग जाओ। ऐसा करने से थोड़ी देर में ही तुम अपने मन को शांत कर लोगे।

“ध्यान हर चीज की कुंजी है। अगर हम खुश और शांतिपूर्ण जीवन चाहते हैं तो हम इस सुख का आनंद तब ले सकते हैं जब हम मन की इस बेचैन और अस्पष्ट प्रवृत्ति को दूर कर लें। इसका मतलब है कि हमें संतुलित स्थिति में पहुंचना है। चिंतन मन के बिना संतुलित स्थिति संभव नहीं हो सकती। चिन्तन मन हमारे मन को नियमित किए बिना संभव नहीं है और ध्यान के बिना नियमित मन संभव नहीं है।”
दाजी

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