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अब तिलक बरक्षा धार बराते बहुत बड़ी मनमानी बा..

अब तिलक बरक्षा धार बराते बहुत बड़ी मनमानी बा..

अब तिलक बरक्षा धार बराते बहुत बड़ी मनमानी बा..
अशोक बेशरम की हास्य कविता और रामबाबू के गीतों ने बांधी शमां-
करछना।भगवान विश्वकर्मा जयंती के मौके पर घटवा स्थित कुवंर सिंह के कारखाने में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन देरशाम तक चला।इस दौरान मंच पर पहुंचे हास्य कवि अशोक बेशरम ने अपनी हास्य व्यंग की कविताओं से खूब तालियां बटोरी।उनकी गंवई बोली की कविता-अब तिलक बरक्षा,धार बराते बहुत बड़ी मनमानी बा,सबके फरियाथै इंही समय कि केकरे केतना पानी बा।ने श्रोताओं की जीभर गुदगुदाया।रामबाबू यादव और साथी कलाकारों ने अपने पुरबी और कजरी गीतों से खूब समां बांधी तो वहीं बबलू दीवाना,अभयराज यादव,राजेंद्र सिंह और भाईलाल ने विश्वकर्मा भगवान की अर्चना के गीतों से लोगों को भाव विभोर किया।आयोजक कुंवर सिंह कवि कलाकारों का सम्मान करते हुए कहा कि यह परंपरा जगत शिल्पी के सम्मान में प्रतिवर्ष आगे बढाई जाती रहेगी।इस मौके पर देव नारायण पांडेय़,नंदलाल शुक्ला,अरूण कुमार मिश्रा,शिव प्रसाद,सूर्यभान यादव,वीरेंद्र कुमार,रणजीत सिंह,बलराम प्रजापति,रामचंद्र,लोकनाथ,अमर बहादुर समेत बड़ी संख्या ग्रामीण श्रोता मौजूद रहे।

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