ईश्वर
हम जब तक धर्म की सीमाओं से अबद्ध रहते हैं,धर्म का ईश्वर हमारी दृष्टि में रहता है तब तक हम एक या दूसरे विचारों में उलझे रहते हैं।उच्चतम आध्यात्मिक उपलब्धि तभी संभव है जब हम धर्म की सीमा के पार चले जाते हैं। वास्तव में जहां धर्म की सीमा समाप्त हो जाती है वहां से आध्यात्मिकता का प्रारंभ होता है। धर्म मनुष्य की मुक्ति मार्ग पर अग्रसर होने की तैयारी में एक प्रारंभिक अवस्था है। धर्म का अंत आध्यात्मिकता का प्रारंभ है, आध्यात्मिकता का अंत वास्तविकता का प्रारंभ है और वास्तविकता का अंत ही वास्तविक आनंद है। जब वह भी समाप्त हो जाता है,हम अपने गन्तव्य पर पहुंचे होते हैं। यह उच्चतम सीमा है जो शब्दों में लगभग अवर्णनीय है।
इस प्रकार ईश्वर किसी धर्म या वर्ग विशेष में प्राप्य नहीं है। वह न तो किसी निश्चित रूप और क्रिया में आबद्ध है न उसे प्राप्त ग्रंथों में ढूंढ़ा जा सकता है। उसे हमें अपने हृदय के अन्तरतम में ढूंढ़ना होगा। वास्तव में ईश्वर बड़ा सरल और सादा है।वह ठोस रूप में नहीं है। उसमें किसी प्रकार की ठोसता नहीं है। ईश्वर सरल एवं अति सूक्ष्म है। तथ्य यह है कि मूलभूत तत्व की सरलता और शुद्धता ही उसके लिए पर्दा बन गई है।
बाबूजी महराज










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