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फकीर और परिंदा

हम सोचते है कि हम आजाद है, पर क्या हम सच मे आज़ाद हैं?

फकीर और परिंदा

एक सूफी फकीर मस्जिद में बैठकर अल्लाह से अपनी लौ में लीन थे। चारों तरफ प्रकाश फैला था। तभी अचानक झरोखे से एक पक्षी अन्दर आ गया। वह कुछ देर तक तो अन्दर इधर-उधर घूमता रहा। फिर बाहर निकलने की कोशिश करने लगा। कभी वह इस कोने से निकलने की कोशिश करता, तो कभी उस कोने से।

उसकी छटपटाहट बढती जा रही थी। कभी वह दीवार से टकराता, तो कभी छत से। किन्तु उस तरफ नहीं जाता, जिस तरफ वह झरोखा था, जहाँ से वह अन्दर आया था।

फकीर बहुत ध्यान से देख रहा था। उसे चिंता हो रही थी कि उसे कैसे समझाए कि जैसे अन्दर आने का रास्ता निश्चित है, उसी प्रकार बाहर जाने का रास्ता भी निश्चित है। द्वार तो वही होता है, किन्तु सिर्फ दिशा बदल जाती है।

फकीर ने उसे बाहर निकालने की कोशिश की किन्तु वह उतना ही घबरा जाता और बैचेन होने लगा। उसे लगता कि वह उसे मारने आया है।

फकीर उस पक्षी को देखकर भीतर ही भीतर विचार करने लगे कि इस संसार में आकर क्या हम इसी परिंदे की तरह नहीं उलझ जाते? जब हम जन्म लेकर इस संसार में प्रवेश करते हैं, तब हमारे पास उससे निकलने का रास्ता तो होता है, पर अज्ञान के कारण हम उस रास्ते को देख नहीं पाते।

जीवन के चारो ओर के प्रलोभन और व्यवधान हमें सुख-दुख पहुँचाते रहते हैं, और इसके घेरे मे हम छटपटाते रहते हैं, इसी पक्षी की तरह!
कोई हमे इस घेरे से बाहर निकालने मे हमारी मदद कर सकता है, बस जरूरत है उसे पहचानने की। और उसके लिए जरूरी है, अपने ह्रदय से जुड़कर अपने विवेक को जगाने की।
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“अज्ञानी” का मतलब “ज्ञान या समझ का न होना” नहीं है, बल्कि इसका मतलब होता है “उद्देश्य का न होना या ज्ञान का अर्थ न पता होना।”
लालाजी

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