इस वर्ष 18 मार्च 2022 को मथुरा में फलिन के पुजारी ने होलीदान के आग्निकुण्ड को पैदल ही पार किया…जय श्री कृष्ण..।
प्रभु श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को प्रह्लाद की लीला दिखाई थी जो आज भी उनके कदमों पर चलती है।
फालिन शब्द फाल्गुन से आया है, यह वह स्थान है जहाँ नारद मुनि कयाधु (प्रह्लाद की माता) को शिक्षा दे रहे थे।
एक प्रह्लाद मंदिर और प्रह्लाद कुंड है जो इस स्थान पर बहुत शक्तिशाली है।
हर साल मंदिर के पुजारी प्रह्लाद मंत्र का जाप करते हुए 15 फीट ऊंची और 15 फीट चौड़ी जलती आग को पार करते हैं,वह होली से 40 दिन पहले से ही अपनी तपस्या शुरू करते हैं, अनाज और नमक और सब्जियां नहीं खाते हैं और केवल फलहार करते हुए मंत्र जाप करते हैं।
होली के दिन प्रातः 4:00 बजे पुजारी अग्निकुण्ड “प्रह्लाद कुंड” में अग्निस्नान कर के ही यह ब्रत समाप्त करते हैं, और ऐसा माना जाता है कि प्रह्लाद के देवता के कंपन पुजारी के शरीर में प्रवेश करते हैं। वे आग को पार करने से पहले बड़ी लपटों पर अपना हाथ रखकर आग की जांच करते हैं। जब उसका हाथ नहीं जलता, तो वे समझते हैं कि यह आग पार करने का समय है। फिर वे आग की बड़ी लपटों को पार करने लगते हैं, जहां खड़ा होना भी मुश्किल होता है। होली के दहन पर रात में इस त्योहार को देखने के लिए दुनिया भर से एक दिन पहले ही हजारों लोग कंपन में इकट्ठा होते हैं।
मथुरा और भक्त प्रहलाद की कथा आप सभी ने सुनी होगी। उन्हें मारने के इरादे से बुआ होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर आग के बीच बैठी थीं। लेकिन प्रहलाद फिर भी उस आग के बीच से सुरक्षित बाहर आ गए थे। इस चमत्कारी घटना को मथुरा के फालैन गांव में एक परंपरा का रूप दिया गया है। वर्षों से यहां हर साल परंपरा के नाम पर इस खतरनाक खेल खेला जाता है। एक ब्राह्मण पंडा हर साल होली के लिए जलाई जाने वाली धधकती आग के बीच से होकर गुजरता है, लेकिन उसे कुछ नहीं होता। इसे देखने वाले भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।
फलेन गांव में बने प्रहलाद मंदिर के पुजारी बाबूलाल पंडा बताते हैं कि करीब 500 साल पहले यहां आकर बसे एक साधु को सपना आया था कि गांव में नरसिंह भगवान और उनके भक्त प्रहलाद की एक मूर्ति है। उन्होंने साधू ने उनके पूर्वजों को खुदाई करने के लिए कहा। खुदाई करने पर मूर्ति निकल आई। इससे साधू बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बाबूलाल पंडा के पूर्वजों को आशीर्वाद दिया कि परिवार पर कभी आग का कोई असर नहीं होगा। बाबूलाल पंडा बताते हैं कि उस जमाने से ही हमारे पूर्वज इस मंदिर के सेवक रहे हैं और तब से ही परिवार का कोई एक सदस्य आग के बीच चलने की प्रथा निभा रहा है।
पंडित बाबूलाल पंडा खुद इस प्रथा का हिस्सा वर्ष 2016 में बने थे। उनका कहना है कि इस प्रथा के जरिए वे भक्त प्रहलाद की शक्ति प्रदर्शित करते हैं।
बाबूलाल पंडा के मुताबिक वे फाल्गुन की पूर्णिमा से ही कुण्ड के समीप स्थित प्रहलाद जी के मंदिर में एक माह तक विशेष पूजा-अर्चना और तप करते हैं। इस बीच वे अन्न छोड़ देते हैं और दिन में एक बार केवल फलाहार करते हैं। जमीन पर सोते हैं। इस एक माह के विशेष अनुष्ठान के दौरान वे गांव की सीमा से बाहर भी नहीं जाते। होलिका दहन से 24 घंटे पहले मंदिर में हवन शुरू हो जाता है और होलिका दहन के मुहूर्त के आसपास जैसे ही उन्हें अग्नि में शीतलता का अनुभव होता है, वे कुण्ड में स्नान करते हैं और उनकी बहन जलती होलिका को अघ्र्य देती हैं, जिसके बाद धधकती होलिका के बीच गुजरते हैं और सकुशल निकल आते हैं।
इसको आस्था कहेंगे या श्री कृष्ण जी की असीम कृपा यह तो आप ही कहेंगे मैं तो श्री कृष्ण का चमत्कार ही कहुगा जिसको विश्वास न हो वह अगले वर्ष जरूर जाऐ..!










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