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《 निराश नहीं होना चाहिए 》
निराशा ही वास्तविक बाधा है। यदि उसको हटा दिया जाये, तो हमारी कूच आसान और सहज हो जाती है और हम में शीघ्र ही ईश्वर के प्रति अधीनता और समर्पण के भाव का विकास होने लगता है। सच में, हम स्वयं ही अपने भाग्य के वास्तविक निर्माता हैं; इसीलिये हमारा अधिकांशतः भविष्य,हमारे ख़ुद पर ही निर्भर है। यहाँ समय और उम्र की कोई सीमा नहीं होती। आत्मा कभी वृद्ध नहीं होती; इसलिये आध्यात्मिकता तनिक मात्र भी वृद्ध अवस्था से प्रभावित नहीं होती। आध्यात्मिक स्तर पर व्यक्ति, जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर हमेशा ख़ुद को युवा समझता है। अतः आध्यात्मिक क्षेत्र में कुछ भी प्राप्त करने के लिये कभी भी देर नहीं होती।
इसमें कोई शक नहीं कि प्रत्येक मनुष्य में कमियाँ और कमजोरियाँ होती हैं परन्तु मुझे ऐसा कोई भी कारण नहीं मिला कि उनके प्रति नकरात्मक सोच रखी जाये। हमें कभी भी निराश नहीं होना चाहिये। उदासी और निराशा आध्यात्मिक जीवन के लिये सबसे बुरे ज़हर हैं। इच्छा शक्ति, श्रद्धा और आत्म विश्वास आध्यात्मिकता के प्रमुख अंग हैं। वे हमारे मन को घेरे हुवे दुःख और निराशा के बादलों को हटा देते हैं।
☆ श्रद्धेय श्री बाबूजी महाराज ☆









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