गुरुदेव के विचार
"मैंने आपको बताया है कि बाबूजी की आंखों में इतनी गहराई थी कि आप अनन्त तक देख सकते थे। जब वे आपकी ओर देखते थे जो उन्हें दीखता था उसमें कोई जिज्ञासा नहीं होती थी, एक सरसरी निगाह जिससे आपकी आंखों के माध्यम से वे भीतर तक झांक सकते थे। इस लिए हममें से अधिकतर नजर घुमा लेते थे। मास्टर से दृष्टि न मिलाना हमारा भय दर्शाता था, हम यह भी नहीं चाहते थे कि वे हमारी आंखों में झांके। ऐसे में हमारी उग्रता, हमारी सारी शक्ति,सारा अभियान स्वयं में विश्वास सब समाप्त हो जाता है। इसी कारण हम नहीं चाहते थे कि बाबूजी हमारी आंखों में झांके- उच्चतम विकसित लोग भी,केवल कुछ को छोड़कर। हम में इतना साहस होना चाहिए कि अगर हम उनकी ओर नहीं देख सकते तो कम से कम उन्हें अपनी आंखों में देखने दें।यह डाक्टर के पास जाने तुल्य है। वह तुम्हें केवल निदान के उद्देश्य से देखता है अगर आप उसे अनुमति देंगे तब- जो आप कर नहीं दिखाना चाहते वह नहीं देखेगा।"









Leave a Reply