Jan Media TV

Inform Engage Inspire

Advertisement

अगर तुम हंस के बोलो तो सिकन्दर टूट जाता है।कवियों के शब्द रंगों से सराबोर हुए श्रोता।

अगर तुम हंस के बोलो तो सिकन्दर टूट जाता है।
कवियों के शब्द रंगों से सराबोर हुए श्रोता।
करछना। क्षेत्र की लोंहदीं गांव में आयोजित सबरस कवि सम्मेलन में मंच पर पहुंचे कवियों ने शब्द रंगों की फुहार से श्रोताओं को सराबोर कर दिया। लोक कवि राम लोचन सांवरिया की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ कवि सुशील शुक्ल हर्ष की वाणीवंदना और आध्यात्मिक गीत के साथ हुआ। अपने धारदार संचालन के दौरान मुक्तक और छंन्दों के द्वारा हास्य कवि अशोक बेशरम ने श्रोताओं को जी भर गुदगुदाया। उन्होंने पढा़-अगर तुम हंस के बोलो तो सिकंदर टूट जाता है,उछलते ज्वार भाटो में समुंन्दर टूट जाता है।हमारी अपनी फितरत है,मेरा अपना तजुर्बा है कि शीशा तान के मारो तो पत्थर टूट जाता है। कृष्णकांत कामिल की ग़ज़ल, उन्हीं के घरों में उजाला न होगा। चरागों को जिसने संभाला न होगा,खूब सराही गई। सबरेज इलाहाबादी ने वसन्ती गीत प्रस्तुत कर लोगों को खूब गुदगुदाया तो वही संजय पाण्डेय सरस ने,फिर वह वसन्त कब आएगा जैसे गीतों पर खूब तालियां बटोरी। बिपिन बिहारी त्रिपाठी की रचनाओं पर भी श्रोता देर रात तक लोटपोट होते रहे। अध्यक्षीय काव्य पाठ के दौरान नरिया होइ गइ नहर फलाने और भाइ रहे भइकरा होइ गए,बइरी के चउतरा होइ गए जैसी कविताओं द्वारा रामलोचन सांवरिया ने खूब वाहवाही लूटी। आयोजक कमलाशंकर त्रिपाठी ने कवियों के प्रति स्वागत आभार प्रकट करते हुए मंच पर सम्मानित किया इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रोता जन मौजूद रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *