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स्वामी रामतीर्थ*

स्वामी रामतीर्थ*

हमारे जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है?

स्वामी रामतीर्थ

स्वामी रामतीर्थ, विदेश प्रवास के दौरान जापान में अपने आध्यात्मिक कार्य को समाप्त कर, जहाज से अमेरिका की ओर जा रहे थे। एकांत प्रिय स्वामी रामतीर्थ उन्मुक्त भाव से जहाज के डेक पर खड़े सुर्यास्त का आनंद लें रहे थे। जैसे सूर्य की किरणों ने अनन्त और विस्तृत महासागर को अपनी लालिमा से रंग दिया हो। शीघ्र ही जहाज सैन-फ्रांसिस्को के बंदरगाह पर पहुँचने वाला था। सभी यात्री अपना सामान समेट कर उतरने की जल्दी में थे, लेकिन इन सबसे बेफिक्र स्वामी जी जहाज पर टहलते हुए प्रकृति के इस अनुपम दृश्य का आनंद लें रहे थे।

एक विदेशी जो लगातार राम को कौतूहल से देख रहा था, उसने कहा “श्रीमान हम सैन-फ्रांसिस्को पहुँच गए हैं। आपका बैग और आपका सामान कहाँ है।” रामतीर्थ ने कहा “मेरे पास कोई सामान नहीं है, जो कुछ भी है, वह मैं खुद ही हूँ।”

विदेशी ने आश्चर्य से पूछा, “आपकी जरूरी चीजें, रुपए पैसे और आपके कपड़े!” स्वामी जी ने कहा, “मैं रुपए पैसे अपने पास नहीं रखता और कपड़े यही है, जो मैंने पहन रखे हैं। कौतूहल वश विदेशी ने पूछा,” बगैर पैसे के आपका गुजारा कैसे होता है? “

राम ने उत्तर दिया, “मेरे चाहने वालों ने कभी भी इसकी कमी को महसूस नहीं होने दिया। मेरी भूख प्यास और सारी जरूरते वे ही पूरी कर देते हैं।” विदेशी का कौतूहल बढ़ गया। उसने फिर प्रश्न किया, “आपका घर कहाँ है? आप रहते कहाँ है?”

“मेरा अपना कोई घर नहीं। मैंने अपने घर की दीवारें तोड़ दी है। अब यह पूरा संसार ही मेरा घर है।” रामतीर्थ ने जवाब दिया।

वह अमेरिकी निवासी तो जैसे राम के व्यक्तित्व से आत्मविमुग्ध हो गया। उसकी जिज्ञासा अब अपने चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। उसने फिर पूछा, “आपका कोई मित्र या सम्बंधी अमेरिका में होगा?” राम ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा और

कहा, “हाँ! एक मित्र है और वह तुम हो।”

बाद में स्वामी जी का वह प्रशंसक उनका अनन्य भक्त बन गया। स्वामी जी के दो साल के अमेरिकी प्रवास के दौरान उनके सारे आध्यात्मिक प्रवचनों और कार्यक्रमों का प्रबंधन उसने ही किया। अमेरिकी निवासियों ने स्वामीजी पर अगाध स्नेह प्रदर्शित किया। वे उनकी अकिन्चनता और त्याग वृत्ति पर मुग्ध हो गए। अमेरिका में उन्होंने अनेक संस्थाओं की स्थापना की। उनमें से एक प्रसिद्ध संस्था है “हेर्मेटिक ब्रदर हुड”।

इस संस्था के माध्यम से उन्होंने वेदान्त की शिक्षा दी थी। वे कहते थे परमात्मा का चिंतन ही सच्चा कर्म है, फिर चाहे वह न्यूयॉर्क में रहे या हिमालय के एकांत में। यदि चिंतन सदैव एक-सा रहता है, तो प्रभाव भी एक-सा होगा। स्थान, रूप, रंग ढंग आदि का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मनुष्य में जैसे भाव होते है, उसके भाव ही उसका सर्जन करते हैं। जीवन का उद्देश्य बाह्य उपलब्धियों में शक्तियों का अपव्यय करना नहीं, बल्कि अन्तरंग शक्तियों को विकास करना, स्वयं को शिक्षित करना और स्वयं को मन के बंधन से मुक्त कर ईश्वर में लीन हो जाना है। परमात्मा से एक होकर ही परमात्मा को जाना जा सकता है। अगर कोई यह बात हृदयंगम कर लें, तो पारिवारिक सम्बंध ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में कोई रुकावट नहीं डाल सकते।

स्वामी रामतीर्थ सार्वभौमिक प्रेम को सर्वोपरि और समस्त विश्व को अपना मानते थे। वे प्रत्येक मनुष्य और प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का दर्शन करते थे। चाहे छोटा हो या बड़ा सभी से बड़े अदब से मिलते थे और कहते थे, मेरा राम खुद इनके अन्दर निवास कर रहा है। उनका कहना था, सच्चा मनुष्य वह है, जिसके प्रेम का विस्तार सम्पूर्ण विश्व में फ़ैल जाता है। वह जाति, लिंग, वर्ण भेद और सम्प्रदाय की परिधि से बाहर निकल कर सम्पूर्ण विश्व के लोगों से प्रेम करता है।

खुद को “बादशाह राम” कहने वाले राम विश्व में जहाँ भी गए, लोगों ने उन्हें अपने देशवासियों की तरह ही प्यार दिया, फिर चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई सभी उनसे मिल कर अपने आप को धन्य समझते थे।

उन्होंने अमेरिका, जापान, लंदन, मिस्र अनेक देशों का भ्रमण किया। इसका एकमात्र उद्देश्य था, भारतीय दर्शन और साधन प्रणाली से विश्व समुदाय को अवगत कराना। अपनी शिक्षाओं से उन्होंने प्रमाणित कर दिया कि आज के आधुनिक और संघर्ष मय युग में भी मुनियों द्वारा बताए गए ब्रह्म ज्ञान का साक्षात्कार हो सकता है। स्वामी रामतीर्थ का जीवन इसका साक्षी रहा है।

आध्यात्मिक आनंद में मस्त रहने वाले स्वामी रामतीर्थ वास्तव में बादशाह थे। जब पोर्ट सईद बंदरगाह से भारत के लिए लौट रहे थे, तो उन्हें पता चला कि जिस जहाज से वे यात्रा कर रहे हैं, संयोग से लार्ड कर्जन भी उसी जहाज से भारत आ रहे हैं। उन्होंने यह कहकर यात्रा को निलंबित कर दिया कि “दो बादशाह एक ही जहाज में कैसे यात्रा कर सकते हैं।”

लगभग सन् 1904 ईस्वी में बगैर एक पैसे का सहारा लिए, यह निर्भीक संन्यासी अपनी महति योजनाओं पर अमल करते हुए विश्व को अपना आध्यात्मिक संदेश देकर भारत लौट आये।

एक विचार-असल में बादशाह कौन है?

“हृदय की पवित्रता आपकी अंतर्दृष्टि को अत्यन्त शक्तिशाली बना देती है जिससे आप अनेक कार्य करने में सक्षम हो जाते हैं।”
दाजी

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