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प्रकृति का उल्लास पर्व है बसन्त-बेशरमबासन्ती और फाग गीतों का सिमटता लोकरंग चिंतनीय।

प्रकृति का उल्लास पर्व है बसन्त-बेशरम
बासन्ती और फाग गीतों का सिमटता लोकरंग चिंतनीय।
करछना। बदलते मौसम के साथ गुलाबी धूप में निखरी प्रकृति के नूतन आलोक को समाहित किए ऋतुराज बसन्त वास्तव में प्रकृति का उल्लास पर्व है। प्रीति,रीति नीति,अनुहार,मनुहर के लोकरंग और बासंन्ती छटा के बीच अपने समाज में परम्परागत चर्चित रहे बसंन्ती और फाग गीतों का लोकरंग धीरे धीरे सिमटता जा रहा है जो बहुत ही चिंतनीय है। लोक कलाकारों को चाहिए कि अपनी इस थाती और परम्परा को मंचों पर जीवंत करते हुए उल्लास पर्व के आनंद से समाज को जोड़ें। यह बातें आकाशवाणी दूरदर्शन के कार्यक्रमों के प्रस्तोता और चर्चित हास्य कवि अशोक बेशरम ने कही। उन्होंने बताया कि बसन्त पंचमी से शुरू होकर लगभग 2 महीने तक बसन्त और फगुआ गीतों का यह लोकरंग समाज को तार-तार जोड़ता रहा है। बहे पुरवइया उड़ावै गरदी,मोरी देहिया भल बा पियर हरदी।या फिर, अमवा में बउरा आए सखी,परदेसी बलमुआ ना आए। जैसे गीत बसन्त की शुरुआत से ही चर्चित रहे।बसन्ती,फाग,उलार,धमार,बारहमासा,बैसवारा,झूमर,बेलवरिया,
बेलवार,ढा़ईताल,डेढ़़ताल,चौंताल,चैता,चैती जैसे मौसमी गीतों में अपनी लोकसंस्कृति गंवंईपरंम्परा और मस्ती का आलम रचा बसा रहा। रोज शाम चौपालों में ढोल मजीरे के साथ फगुहारों की टोली जम जाती।अपने इन गीतों की गूंज से खेत सिवान घर आंगन तक गूंजते रहे। बसन्तीपंचमी को गांव गांव होलिका की सम्मत गाड़ी जाती और बच्चे भी महीनों मस्ती के साथ होलिका लगाते। आज की आपाधापी और बदलते दौर में हमें चाहिए कि अपने बुजुर्गों की इस परम्परा को लेकर हमारी नई पीढ़ी इसके प्रति जागरूक हो और अपने ऐसे गीतों के लोकरंग को जीवंत रखते हुए अपनी थाती और पहचान को बचाये रखें।

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