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दर्द मे करुणाअपने जीवन में आई मुश्किलों को आप कैसे लेते है?

दर्द मे करुणा
अपने जीवन में आई मुश्किलों को आप कैसे लेते है?

दर्द मे करुणा

यह कहानी, एक महिला सिंधुताई की है, जो भारत के महाराष्ट्र में एक गरीबी से त्रस्त गाँव में रहती थी। जब वह छोटी थी; तब वह स्कूल जाना चाहती थी, परंतु उसके परिवार ने उन्हें भैंसों की देखभाल का काम सौंप दिया। जब वह 9 वर्ष की हुई, तब उनकी शादी लगभग 30 वर्ष के एक पुरुष से करवा दी गई और जब वह 19 वर्ष की हुई, तब तक उनके तीन बेटे थे और वह उस समय गर्भवती थी।

एक माफिया किस्म का व्यक्ति, जो गाँव के लोगों का शोषण कर रहा था, विशेष रूप से गाँव की महिलाओं को वास्तव में कड़ी मेहनत करने के लिए मजबूर कर रहा था और उन्हें व्यावहारिक रूप से कुछ भी नहीं दे रहा था। हर कोई उससे डरता था, लेकिन सिंधुताई ने स्थानीय कलेक्टर, जो कि पुलिस आयुक्त थे उनसे, उस व्यक्ति की शिकायत कर दी, परिणाम स्वरूप उस व्यक्ति को वह जो कर रहा था, उससे रोक दिया गया।

इससे वह व्यक्ति इतना क्रोधित हुआ कि उसने सिंधुताई से बदला लेने के लिए उसके पति से झूठ बोला और कहा, “तुम कितने मूर्ख हो। तुम्हारी पत्नी के इतने पुरुषों के साथ संबंध हैं और वास्तव में जो बच्चा उसके गर्भ में है, वह मेरा बच्चा है, तुम्हारा नहीं। तुमको उस बच्चे को मारना होगा। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे, तो मैं उसको मार डालूँगा और तुम्हें भी मार डालूँगा।” 19 साल की गर्भवती सिंधु ताई के पति ने क्रोध मैं आकर उसे और बच्चे को मारने के लिए, छाती पर ही नहीं बल्कि पेट में भी बार-बार लात मारी। इस कारण वह बेहोश होकर गिर पड़ी।

उनके पति ने सोचा कि वह मर चुकी है, इसलिए वह उन्हें एक गायों के तबेले में घसीट कर ले गए और उन गायों के बीच यह सोचकर छोड़ दिया कि लोगों को लगेगा कि गायों ने उन्हें रौंद दिया है और इस तरह वह मर गई है।

जब वह बेहोशी से उठी, तो उन्होंने पाया कि एक गाय, उन्हें ऊपर से घेर कर उनकी रक्षा कर रही थी। वहाँ इतनी भैंसें, बैल और गायें चल-फिर रही थीं कि वे निश्चित रूप से उसे रौंद देतीं, लेकिन यह गाय उन सब को दूर भगा रही थी। और जब उनके ससुराल वाले यह सुनिश्चित करने के लिए आए कि वह मर गई है, तो उस गाय ने अपने सींगों से उनको भी भगा दिया।

उस गाय के नीचे ही कुछ ही देर में उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया और घंटों तक उस गाय ने उनकी और उनकी बच्ची की रक्षा की।

जब सिंधुताई को पर्याप्त शक्ति मिली, तो उन्होंने गाय को गले लगा लिया और वादा किया, “अभी मुझे मदद की बहुत जरूरत थी; तो तुमने मेरी रक्षा की। जब दूसरों को मेरी जरूरत पड़ेगी, मैं जरूर उनकी रक्षा करूँगी।”

उनको अपने पिता के घर भी पनाह नहीं मिली, क्योंकि उनके यहाँ यह परंपरा थी कि एक बार शादी हो गई तो बेटी कभी घर वापस नहीं आ सकती। यह उन दिनों की एक मूर्खतापूर्ण परंपरा थी।

उनका शोषण न हो इसलिए, वह उस छोटी-सी बच्ची के साथ श्मशान घाट में रहने लगी और शवों के चारों ओर लोग जो गेहूँ डालते थे, उन्हें इकट्ठा करके पानी में मिलाकर लाशों की आग पर पकाती थी। यह उनके लिए अति निराशाजनक और दर्द भरा जीवन बन गया। उन्होंने फैसला किया कि उनकी बच्ची इस तरह नहीं जीएगी और उसी क्षण वह आत्महत्या करने निकल पड़ी। वह अपनी बच्ची को गोद में लेकर रेलवे ट्रैक पर लेट गई और ट्रेन का इंतजार करने लगी, लेकिन जब वह वहाँ लेटी हुई थी, तब उन्होंने किसी के रोने की दर्द भरी आवाज सुनी। वह ट्रैक से एकदम उठकर आवाज़ की दिशा में देखने लगी। उन्हें वहाँ एक बूढ़ा आदमी दिखा जो भूख और प्यास से तड़प रहा था। वह अपंग था और शारिरिक तौर पर बहुत ही अयोग्य था। वह कुछ खाने और पानी के लिए रो रहा था। सिंधु ताई से यह सब देखा नहीं गया, उन्होंने वहाँ के लोगों से भीख माँगी और उस बूढ़े आदमी को भोजन और पानी दिया।

उस दर्द से भरे क्षण में उनके ह्रदय में करुणा जाग गई। उनके भीतर एक दिव्य विचार आया कि यह बूढ़ा आदमी भगवान की आवाज़ है। उसने कृष्ण को पुकारा और कहा कि “मेरे पास अब जीवन में एक उच्च उद्देश्य है, इस दुनिया में कुछ योगदान देने के लिए! मैं आत्म हत्या हरगिज़ नहीं करूँगी।”

पर कुछ देर के बाद, वह एक खेत में बैठी यह सोच रही थी कि “मैं क्या कर सकती हूँ? मेरे पास कुछ भी नहीं है! मेरे पास कोई भी नहीं है! भला मैं किसी की मदद कैसे कर सकती हूँ?”

सोचते-सोचते उनकी निगाह उस पेड़ की एक शाखा पर पड़ी, जिसके नीचे वह अपनी बेटी को गोद में लेकर बैठी थी। उस शाखा को एक लकड़ी काटने वाले ने कुल्हाड़ी से बड़ी बेरहमी से काट दिया था, जो बस एक पतली-सी डोरी के सहारे लटकी हुई थी, फिर भी वह शाखा उन्हें और उनकी बच्ची को छाया दे रही थी। सिंधु ताई को उनके सवालों का जवाब मिल गया। मन ही मन उन्होंने यह तय किया कि चाहे मुझे कितना भी पीटा गया हो, मेरे जीवन में कितना भी दर्द क्यों न हो, फिर भी मैं दूसरों के लिए कुछ कर सकती हूँ।

यहाँ से उन्होंने शरू किया दूसरों के लिए जीना।

उन्होंने बेघर और अनाथ बच्चों को पालना शुरू कर दिया। वह देखभाल करने वाली उनकी माँ बनी। किसी न किसी तरह उन्होंने अच्छा गाना गाना सीख लिया और वह गीत गा-गा कर भीख माँगती थी और उन अनाथ बच्चों को पालती और उन्हें सुरक्षित रखती थी। कुछ समय बाद उनके आस-पास के लोगों ने देखा कि वह कितने बच्चो का जीवन बदल रही है, लोगों ने उनके लिए एक अनाथालय बनवा दिया।

इतने वर्षों में, उन्होंने हमेशा यही कहा कि उनके 1,500 से ज़्यादा बच्चे और 1000 से अधिक पोते-पोतियाँ हैं और उनके अपने जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आया है। उनके सभी बच्चों को उन्होंने उच्च शिक्षा दिलाई। उनमें से कई डॉक्टर, वकील और समृद्ध किसान हैं। उनके साथ कुछ ऐसा हुआ, जो उन्होंने कभी सोचा नहीं था। उन्हें बहुत मान्यता मिली और उन्हें उनकी उपलब्धियों के लिए राष्ट्रपति, राज्यपालों और कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले।

पर वर्षों बाद, एक बूढ़ा व्यक्ति उनके अनाथालय आया, जो भूखा था, बीमार था, बेघर था और आश्रय माँग रहा था। कुछ क्षणों में ही सिंधु ताई ने उसे पहचान लिया कि यह उनके पति है। वह व्यक्ति, जिसने उनकी निर्दयता से हत्या करने की कोशिश की थी।

उन्होंने उससे कहा, “जब तुमने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था, मैं लाचार और बेघर थी। आज तुम बेघर औऱ लाचार हो, पर मेरे पास इतने सारे लोगों को रखने की एक अच्छी खासी जगह है।” उसने अपने जीवन की सबसे सार्थक बात कही।

उन्होंने उसे दिल से माफ़ कर दिया और कहा, “मैं तुम्हें आश्रय जरूर दूँगी, लेकिन आज से मैं तुम्हारी पत्नी नहीं, तुम्हारी माँ हूँ।” और वह सभी लोगों से, जो वहाँ आते थे, उनका परिचय अपने बड़े बेटे के रूप में कराती थी, जो कभी-कभी बहुत शरारत करता था।

एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “मैं अपने जीवन में सभी त्रासदियों को उपहार के रूप में मानती हूँ, जिन्होंने मुझे सशक्त बनाया है।” वह इसे ईश्वर की कृपा मानती हैं। उन्होंने यह भी कहा, “मेरी जीवन यात्रा, एक काटों भरी राह रही है, पर मैंने उन काँटों से दोस्ती कर ली और मेरा जीवन सुंदर हो गया और अब मैं कई अन्य लोगों के जीवन को सुंदरता दे सकती हूँ।”

भौतिकता के बिना प्रभावशाली होने का यह एक छोटा-सा उदाहरण है। करुणा की शक्ति, धन-दौलत की शक्ति से कहीं अधिक है।

जब उस करुणा की नींव पर धन, ज्ञान, शक्ति और कौशल का निर्माण किया जाता है, तो वे हमारी सोच से भी परे फलते-फूलते हैं और जीवन में बहुत बड़ा सकारात्मक बदलाव लाते हैं।

जहाँ तक ​​करुणा का प्रश्न है, हममें से प्रत्येक व्यक्ति के अंदर यह स्वाभाविक रूप से है। जब तक हम जागरूक हैं, कुछ भी और कोई भी इसे हमसे दूर नहीं कर सकता है। करुणा, अनुग्रह का एक सच्चा साधन है; जो भौंतिकता से परे है।

4 जनवरी 2022 को सिंधु ताई के शरीर ने इस नश्वर संसार को छोड़ दिया। पर उनकी करुणा, उनका वात्सल्य सदियों तक जीवित रहेगा।

विश्व के सभी भाई बहनों कि तरफ से उन्हें सादर नमन।
“चुनौतियों को सहर्ष स्वीकार करें और फिर देखें कि कैसी खूबसूरती उभरती है।” 
दाजी

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