श्री संकष्टी गणेश चतुर्थी (गणेश चौथ) 21 को जानें पूजा विधि एवं मुहूर्त
मां भगवती पार्वती जी के एवं भगवान श्री शिव जी के प्रिय पुत्र तथा विघ्नहर्ता,सर्व मंगल दायक ऋद्धि-सिद्धि के पति एवं शुभ-लाभ के पिता अग्रपूज्य भगवान श्री गणेश जी का प्रादुर्भाव माघमास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था।
यथा-“सर्वदेवमयः साक्षात्सर्वमंगलकारकः। माघकृष्णचतुर्थ्यान्तु प्रादुर्भूतो गणेश्वरः”।
जैसा की हमारे धर्मग्रंथों,शास्त्रों,पुराणों में भगवान श्री गणेश जी की बहुत ही महिमा बताई गई है – जो कि विद्या-बुद्धि प्रदायक,मंगलकारी,तथा अपने भक्तों के संकटमोचक सर्वसुख प्रदायक हैं।
माघमास के कृष्णपक्ष चतुर्थी को भगवान श्री गणेश जी का बिधि-बिधान से पूजन,श्रीगणेशअथर्वशीर्ष पाठ,श्रीगणेश चालीसा पाठ,अन्यान्य श्री गणेश स्तुतियां मंत्र जाप एवं दुर्वा,लाजा,मोदक आदि के द्वारा सहस्त्रार्चन,शतार्चन तथा भगवान श्री गणेश जी का अभिषेक,हवन आदि करने तथा ब्राम्हण द्वारा कराने से भगवान श्री गणेश जी शीघ्र ही प्रसन्न होकर अपने साधक,भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।
आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक” जी ने बताया कि भगवान श्री गणेश जी की पूजा में लाल-पीले रंग के ही वस्त्र,फूल, फल,लड्डू,आदि का प्रयोग करना चाहिए।तथा लाल-पीले वस्तुओं का ही दान करना एवं साधक को स्वयं भी लाल-पीले वस्त्र धारण तथा लाल-पीले वस्तुओं का सेवन करना चाहिए।
वैसे तो यह ब्रत संपूर्ण भारत में मान्य है किन्तु उत्तर भारत में यह ब्रत बहुत ही महत्व रखता है।
इसे तिलकुटी एवं वक्रतुंड चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है।
मातायें अपने पुत्र के आयु,बुद्धि तथा सुख की कामना से यह ब्रत धारण करती हैं।तथा भगवान श्री गणेश जी का पूजन एवं चंद्रमा का पूजन कर चंद्र देव को अर्घ्य प्रदान करती हैं।
शास्त्रों के अनुसार यह व्रत चंद्रोदयव्यापिनी ग्रहण किया जाता है। स्थानीय गणनानुसार चंद्रोदय रात्रि – 08:44 मि. पर हो रहा है परन्तु जब चंद्रमा दिखाई देने लगे तब अर्घ्य प्रदान करना चाहिए पूजा का समय रात्रि – 07:15 मि. से 09:15 मि. तक उत्तम है।
बिद्यार्थियों के लिए भी यह ब्रत एवं पूजा बहुत ही लाभदायक है।
आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”
(ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र एवं वैदिक अनुष्ठानों के विशेषज्ञ)
संपर्क सूत्र – 09956629515
08318757871










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