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जीवन के वास्तविक लक्ष्य को पाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है?

जीवन के वास्तविक लक्ष्य को पाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है?

‘उबुदियाह’ (भाग – II)

अब तक की कहानी में हमनें देखा कि अफगानिस्तान में गजनवी वंश के शक्तिशाली मुस्लिम शासक सुल्तान महमूद गजनवी ने सामान्य से हटकर, ऊँची कीमत में एक गुलाम ‘अयाज’ को खरीदा।

सुल्तान अयाज और उसकी सेवा से बेहद खुश थे। कुछ ही समय में, उन्हें अपने इस नए गुलाम से इतना लगाव हो गया कि उन्होंने उसे अपने दरबार का वजीर ए खास बना दिया।

गजनवी द्वारा अयाज को वजीर ए खास बनाये जाने के बाद, बाकी वजीर अयाज को नीचे गिराने के लिए कई तरह के टोटके करते रहे।

एक मौके पर सभी वजीर गजनवी के पास पहुँचे और शिकायत की कि अयाज को वजीर ए खास क्यों बनाया गया जबकि उसके पास वजीर ए खास के तौर पर काम करने के लिए न तो काबिलियत है और न ही जरूरी तजुर्बा?

सुल्तान महमूद गजनवी ने कहा, “क्या आप यह चाहते हैं कि मैं यह साबित कर दूँ कि अयाज आप सभी की तुलना में वजीर ए खास पद के लिए अधिक काबिल हैं?”

सभी मंत्रियों ने हामी में गर्दन हिलाई। उन्होंने सुल्तान से यह साबित करने की गुजारिश करी कि अयाज वजीर ए खास पद के योग्य हैं, ताकि आगे तारीख में उसके खिलाफ उन्हें कोई शिकायत न रहे।

गजनवी ने सभी वजीरों को अगले दिन दरबार में आने को कहा। उन्होंने अपनी इस बात को साबित करने के लिए सभी जरूरी इन्तजाम कर लिए थे कि अयाज वजीर ए खास पद के लिए उन सभी में सबसे काबिल हैं।

अगले दिन सभी वजीर दरबार में हाजिर हुए। गजनवी अपने तख्त पर विराजमान थे और उनके सामने एक बहुत बेशकीमती हीरा रखा था।

गजनवी ने अयाज को वजीर ए खास बनाने के अपने फैसले के खिलाफ खड़े होने वाले वजीरों में से एक को बुलाया। उन्होंने उसे हीरे को करीब से देखने के लिए कहा और पूछा कि, उसके अनुसार उस हीरे का मोल क्या होगा?

वजीर ने बारिकी से परखने के बाद सुल्तान से कहा कि, “हीरा वास्तव में कीमती लग रहा है और इसका मोल कम से कम दस लाख दिरहम होना चाहिए।”

फिर गजनवी ने पूछा, “इस हीरे का क्या मोल होगा यदि यह टूट जाए?”

वजीर ने कहा कि, “हीरे का कोई मोल नहीं होगा, अगर वह टूट गया तो।”

ताज्जुब की बात यह रही कि गजनवी ने उस वजीर को वह हीरा तोड़ने का हुक्म दे दिया। जाहिर तौर से वह वजीर ऐसा करने में संकोच कर रहा था क्योंकि हीरा बेशकीमती था। वह इतनी कीमती चीज को तोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकता था। इसलिए वो अपनी गर्दन नीचे करके एक ओर खड़ा हो गया।

फिर गजनवी ने एक और वजीर को बुलाया। गजनवी ने उससे भी वही सवाल किया। दूसरे वजीर ने भी हीरे की तहकीकात करने के बाद कहा कि, “यह हीरा बहुत कीमती है और इसकी कीमत लगभग बीस लाख दिरहम हो सकती है। गजनवी ने आगे सवाल किया, “और अगर यह टूट गया तो?”

उस वजीर ने भी यही जवाब दिया कि अगर यह टूट गया तो इसकी कोई कीमत नहीं होगी।

गजनवी ने उसे भी हीरे को तोड़ने को कहा। सभी वजीर चौंक गए। जब पहला वजीर यह नहीं कर सका तो वह दूसरा वजीर हीरे को तोड़ने की जुर्रत कैसे कर सकता था?

इसलिए उसने भी पहले वजीर की ही पंक्ति में शामिल होने के लिए उस तरफ कदम बढ़ा लिया।

इसी तरह, वे सब वजीर जो गजनवी के फैसले पर सवाल उठा रहे थे, आए और अपने मालिक के हीरे को तोड़ने के आज्ञा का पालन न करके एक कतार में खड़े हो गए।

अंत में, गजनवी ने अयाज को पेश होने को कहा और उसे हीरे पर गौर फरमाकर उसकी कीमत जाहिर करने को कहा।

अयाज ने हीरे की कीमत बाकी वजीरों की बताई कीमत से भी कहीं ज्यादा बताई।

फिर गजनवी ने पूछा, “अयाज, अगर यह हीरा टूट गया तो क्या होगा?”

अयाज ने वैसा ही कहा जैसा बाकी वजीरों ने कहा था, यानी हीरे के टूटने पर उसका कोई मूल्य नहीं रह जायेगा।

अंत में, गजनवी ने उसे भी हीरे को तोड़ने के लिए कहा।

दरबार में मौजूद सभी लोग हैरान और ताज्जुब थे। अब सबकी नजरें अयाज और केवल अयाज पर ही थी।

अयाज ने अपने मालिक के हुक्म पर दोबारा सोचे बिना ही हीरे को उसी वक्त तोड़ दिया।

गजनवी हैरान रह गए और बोले, “अयाज, तुमने इतना कीमती हीरा तोड़ दिया। तुम यह कैसे कर सकते हो?”

इस पर अयाज ने जवाब दिया, “मालिक, आपका हुक्म मेरे लिए हीरे से कहीं ज्यादा कीमती है।”

और, इस तरह अयाज न केवल अपने नए मालिक की उम्मीदों पर खरा उतरा, बल्कि उसने यह भी साबित किया कि उसके बारे में उसके पिछले मालिक के दावे भी सही थे।

अयाज अपने मालिक का सच्चा गुलाम बनना जानता है। वह जानता है कि अल-उबुदियाह का वास्तव में अर्थ क्या है।

अपने इस रवैये के साथ, अयाज ने अपने मालिक के लिए पूर्ण समर्पण और आज्ञाकारिता का प्रदर्शन किया।
उसने बताया कि इस दुनिया में गुलाम के लिए अपने मालिक के आदेश से बढ़कर और कुछ नहीं हो सकता।

हम सब सर्वशक्तिमान के बंदे हैं। ऐसा भी समय आता हैं, जब हमारी योजनाओं और सर्वशक्तिमान की योजनाओं के बीच अंतर होता है। इस अंतर को पाटना ही, उनकी इच्छा के प्रति हमारा पूर्ण समर्पण है।

हो सकता है कि उस समय स्थिति में हमें ज्यादा समझ में न आए, लेकिन हमें अपने तर्क, अपने डर और शंकाओं को दूर करने का साहस उठाना चाहिए और विश्वास करना चाहिए कि उनके पास हमारे लिए कोई बड़ी योजना है।
ये ऐसे समय हैं जब हमारे साहस और उन पर विश्वास की परीक्षा होती है

सैनिक को हर आदेश समझ आ जाये, ये जरूरी नहीं होता, लेकिन वह उस आदेश का पालन करता है, इस विश्वास में कि किसी के पास वह बड़ी योजना है और उसकी व्यक्तिगत भूमिका उस बड़ी योजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।हमारे लिए भी यही सच है।

परमेश्वर की बड़ी योजनाओं के लिए हमारी आज्ञाकारिता महत्वपूर्ण है।

_*क्या हम इतना साहस विकसित कर सकते हैं कि अपने गुरु की हर आज्ञा का पालन कर पाएं और जीवन के वास्तविक लक्ष्य को पालन कर पाए *”प्रेम की स्वाभाविक अवस्था समर्पण करना है।”*
चारीजी महाराज

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