नदी और शेर की कहानी*
पढ़ने से पहले… धीरे से अपनी आँखें बंद करें… एक गहरी सांस लें… एक पल के लिए ठहराव महसूस करे… पढ़ना जारी रखे…
नदी और शेर की कहानी
जीवन है तो सुख भी आएगा, दुख भी आएगा, कठिन परिस्थितियाँ भी आएगी तो खुशी के पल भी आएंगे, लेकिन हर परिस्थिति में हम थोड़ा ठहर कर, थोड़ा रुक कर, फिर उसे समझ कर आगे बढ़े तो इसे क्या जादू होगा आज हम इस कहानी से जानते हैं।
एक समय की बात है। एक जंगल में भारी बारिश होने के कारण नदी का पानी चारो तरफ फैल गया और एक शेर को नदी को पार करने के लिए उस नदी के पानी का सामना करना पड़ा। क्योंकि उस नदी ने बारिश के वजह से उसे घेर लिया था। और वह था शेर इसीलिए तैरना उसके स्वभाव में नहीं था, लेकिन परिस्थिति ऐसी हो गई थी कि “या तो वह उसे पार कर ले या उसमें डूब के मर जाए।”
शेर दहाड़ते हुए आवेश में नदी के ऊपर खूब चिल्लाया, क्योंकि वह नदी मे लगभग डूबने लगा था। कई बार उसने पानी पर हमला किया, लेकिन हर बार वह नदी पार करने में असफल रहा।
थक हार कर शेर लेट गया और चारों तरफ खामोशी छा गई। उस खामोशी में उसने नदी को कहते सुना कि, “जो यहाँ नहीं है उससे कभी मत लड़ो।”
शेर ने ध्यान से सुना और पूछा, “यहाँ क्या नहीं है?”
“आपका यहाँ कोई दुश्मन नहीं हैं।” नदी ने उत्तर दिया। “जैसे आप सिंह हो, वैसे ही मैं भी नदी हूँ। मैं आपकी दुश्मन नहीं हूँ। “
यह सब सुनकर अब शेर रुक गया और वह शांत होकर बैठ गया। उस शांति के पल में उसने नदी के रास्तों का अध्ययन किया। जिससे कि वह यह समझ पाया कि उसे नदी कैसे पार करनी है। थोड़ी देर के बाद, वह वहाँ चला गया जहाँ एक निश्चित धारा किनारे से टकराती थी और अंदर कदम रखते हुए दूसरी तरफ तैरने लगा क्योंकि वहां नदी का प्रवाह कम था। और बिना किसी मुश्किल के उसने नदी पार कर ली।
क्या हम भी किसी से लड़ रहे हैं? अपनों के साथ या खुद के साथ….
दोस्तों जीवन एक संघर्ष नहीं, जीवन एक सफर है। इस सफर में आती हुई हर परिस्थिति से लड़ने या जूझने से पहले कुछ पल रुक कर, उन पलों में पूरी तरह ठहर कर और उस ठहराव को महसूस करके अध्ययन करें, तो हम समझ पाएंगे कि यहाँ लड़ने के लिए कुछ भी नहीं है।
अपने जीवन में और अन्य रिश्तो में हमारे अहंकार और गौरव को जाने दें और गर्जना बंद करे। थोड़ा रुके, मुस्कुराए और उस मुस्कुराहट को फैलने दें।
सुखी और शांतिपूर्ण जीवन के उपायों को जानकर हम चारों तरफ इस मुस्कराहट को बिखेर सकते हैं।
“यदि एक बार मन सामंजस्यपूर्ण स्थिति में आ जाए तो फिर न बाहरी परिस्थितियों काऔर न वातावरण का उस पर कोई प्रभाव होगा और न ही आंतरिक अशांति होगी।”
बाबूजी









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