बहु के लिए क्या होली क्या दिवाली?
होली वाले दिन संध्या बेमन से रसोईघर में होली खेलने आने वाले लोगों के लिए पकोड़े और दही भल्ले बनाने जा रही थी अभी उसने रसोई में कदम रखा ही था कि तभी उसकी सास कुसुम उससे बोली” बहु पकौड़े और दही भल्ले मैंने हलवाई से कहकर बनवा दिए हैं तू अपने पति और अपनी सहेलियों के साथ रंगों से होली खेल” सास की बात सुनकर संध्या उनकी तरफ आश्चर्य से देखने लगी तो वह मुस्कुराते हुए बोली” इसमें आश्चर्य की क्या बात है ?तेरा भी तो मन करता होगा होली खेलने को जा जी भर के सबके साथ रंगों से खेल”
” सच मम्मी जी तब तो मैं जी भरकर खेलूंगी” कहते हुए संध्या खुशी से उछल पड़ी थी दोनों हाथों में रंग भर के सासु मां के चेहरे पर रंग लगा दिया फिर उनके पैर छूकर पति और सहेलियों के साथ मस्ती से होली खेलने लगी थी बहू को शादी के कई साल बाद पहली बार इतना खुश देख कर उन्हें 1 दिन पहले की याद आ गई थी जब वे खाना खाने के बाद रात के वक्त वक्त लान में टहल रही थी तब उन्होंने सुना संध्या अपनी सहेली से फोन पर बात करते हुए कह रही थी “बहु के लिए क्या होली क्या दिवाली? हमारा तो सारा दिन घर में आने वाले मेहमानों के लिए पकवान बनाने में ही बीत जाता है सास ससुर ने पहले से ही आदेश दे दिया है कई तरह के पकौडे, दही भल्ले बनाने का गुझिया हलवाई के यहां से आ जाएंगी सास ससुर और ये अपने यार दोस्तों के साथ खूब होली खेलते हैं बहू को काम की जिम्मेदारी तो सौंप देते हैं यह नहीं सोचते कभी की बहू का भी मन करता होगा होली खेलने को अच्छा अब मैं फोन रखती हूं सुबह जल्दी उठकर खाने की तैयारी करनी है” फिर वह फोन रख कर बिस्तर पर लेट गई थी।
संध्या की बातें सुनकर कुसुम सोच में पड़ गई थी अपने पति और बेटे से बातें करके उसने निर्णय ले लिया था बहू के सिर से जिम्मेदारियों का बोझ कम करने का ताकि वह भी खुशी-खुशी सबके साथ रंगों से खेल सके रंगो की होली है।” मम्मी जी कहते हुए संध्या ने जब दोबारा उनके चेहरे पर खुशी से रंग लगाया तो बहू को खुश देख कर आज संध्या बेहद खुशी महसूस कर रही थी।
*🪷🪷।। शुभ वंदन ।।🪷🪷*
🪷🪷प्रेषक: डॉ दर्शन बांगिया🪷🪷









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