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चल रही स्वांस से ही जग का नाता है

चल रही स्वांस से ही जग का नाता है

प्रतिदिन हमारी स्वांस चल रही है जब से जन्म हुआ तभी से चल ही रही है | कभी रुकती नहीं बस चले जा रही है | सोचों क्या कभी हमनें इसे चलाने का प्रयत्न किया नहीं किया फिर भी स्वयं ही चले जा रही है |
हम सोचतें हैं कि हमेशा ऐसे ही चलती रहेगी परन्तु ऐसा नहीं है एक दिन कुछ नया होगा जो हमारे जीवन में आज तक नहीं हुआ वह यह है कि यह चलती हुई स्वांस एक दिन अचानक रुक जाएगी बिना कोई सूचना दिए,बिना चेतावनी दिए ही इस पल के बाद वह फिर नहीं चलेगी उस पल के बाद हैरान,परेशान हो कर हम देखेंगे कि शरीर हमारे सामने ही होगा परन्तु हम शरीर के बाहर होंगे इस जग का सारा रिश्ता नाता ही समाप्त हो जाएगा हम सबको देख पायेंगे हमारा परिवार,पत्नी या पति,बच्चे,घर के सदस्य,मित्र,संबंधी सब घेर कर खड़े रहेगें सभी परेशान रहेगें,हमारे जाने से दुखी रहेगें हम सब को बताना चाहेंगे कि हम तो यहीं हैं परंतु कोई हमें देख,सुन नहीं पाएगा |
ऐसा एक दिन होना निश्चित है सूर्य उस दिन भी निकलेगा,फूल भी खिलेंगे,रात भी होगी परन्तु हम उस देह में पुनः नहीं आ पायेंगे हमारे साथ कुछ नया सा हो जाएगा प्रतिदिन का उठना,सोना,जगना,काम करना,प्रतिदिन की भाग दौड़ सब समाप्त हो जाएगी अपनों में रह जायेंगी बस हमारे जीवन की अच्छी बुरी यादें |
चलती हुई इसी स्वांसों से ही इस जग में सारा नाता है |
बंद हो जाती है जिस दिन ये सब समाप्त हो जाता है |

आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”

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