लोक साहित्य हमारे पुरखों की थाती,इसे बचाना जरूरी:बेशरम
करछना। आधुनिक जीवनशैली की आपाधापी के बीच बदलते रागरंग में हमारे पुरखों की थाती रहे अपने लोक साहित्य को बचाना बहुत जरूरी है।इसी लोक साहित्य में रची बसी अपनी संस्कृति,संस्कार,लोक परम्पराओं की रागात्मकता हमारे समय,समाज,लोकजीवन और अतीत की अनमोल पूंजी है।एसीआईटी साधुकुटी में संस्थान के बच्चों को इसे सहेजने हेतु चर्चित हास्य कवि और आकाशवाणी दूरदर्शन के कार्यक्रम प्रस्तोता अशोक बेशरम ने यह बातें कही।उन्होंने बताया कि यही लोक साहित्य अपने अतीत में सामाजिक रीति रिवाजों,किस्से कहानियों,लोकोक्तियों मुहावरों लोकगाथाओं,लोकनाट्य और लोकगीतों की परंपरा का संवाहक रहा है।अपने कर्मकाण्ड, जातिगीत,श्रमगीत,ब्रतगीत,मौसमगीत,संस्कार गीतों के लोकरंग हमारी असली जमीन और हमारे बुजुर्गों की विरासत है। आज के बदलते दौर में नयी पीढ़ी को चाहिए कि भटकाव से बच बचाकर,अपनी लोककथाओं,लोक भाषणों,लोकगाथाओं की उस परम्परा को अपने लोकजीवन से जोड़ते हुए लेखन और मंचन के माध्यम से अपनी सोंधीमाटी की महक से जुड़े। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ लोकगायक अवध नारायण यादव ने बच्चों को आज के बहकते वातावरण से सचेत करते हुए ओछे,अश्लील और घटिया गानों से बचने के साथ-साथ अपने लोकगीतों से जुड़ने के प्रति प्रेरित किया। बच्चों ने भी अपने गांवो में होली,फाग,कजरी,नौटंकी,रामलीला,खेल तमासा जैसी चीजों के साथ साथ अपने लोक साहित्य को संजोने का संकल्प लिया।










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