पढ़ने से पहले…एक पल का ठहराव लें…और चिंतन करें…आज आपने अपने साथ कितना समय बिताया?
ध्यान का अर्थ
राबिया नाम की एक संत महिला थी। वह अपनी झोंपड़ी में बैठकर प्रात:काल ध्यान कर रही थी। उनके घर में एक अन्य व्यक्ति हसन भी था।
सुबह हो चुकी थी और सूरज निकल चुका था। पक्षी गीत गाने लगे थे। वह एक खूबसूरत सुबह थी। आसमान में सफेद बादल तैर रहे थे। ठंडी हवा चल रही थी। हसन ने घर से बाहर आकर इस खूबसूरती को देखा।
उसने जोर से पुकारा, “राबिया, तुम अंदर क्या कर रही हो? बाहर आओ! भगवान ने एक बहुत ही सुंदर सुबह को जन्म दिया है। पक्षियों के प्यारे गीत हैं, सूरज की खूबसूरत किरणें हैं, ठंडी हवा है। बाहर आओ! ऐसे में कोई अंदर क्या कर सकता है?”
राबिया ने जोर से हँसते हुए कहा, “हसन, तुम कब तक बाहर रहोगे? तुम्हें अंदर आने की जरूरत है! क्योंकि बाहर तुम भगवान द्वारा बनाई गई सुबह को देख रहे हो और अंदर मैं खुद में उसे देखती हूँ जिसने यह सुबह बनाई है। सुबह खुबसूरत है, लेकिन इस खुबसूरत सुबह बनाने वाले से उसकी क्या तुलना की जा सकती है?
सूरज सुंदर है, उज्ज्वल है, लेकिन उसकी तुलना क्या उससे की जा सकती है जिसने सूरज को बनाया है! पक्षियों के गीत मनभावन हैं, परन्तु मैं उसका गीत सुनती हूँ, जिस ने सब गीत रचे हैं; जो सब पक्षियों के शब्दों से भी शीतल है। हसन, तुम अंदर आओ।”
हसन चौंक गया। हसन ने नहीं सोचा था कि बात इस तरह का मोड़ लेगी। लेकिन राबिया ने जो कहा वह सही था।
हसन और राबिया मानवता के दो प्रतीक हैं। हसन बाहर खोज रहा है, राबिया भीतर खोज रही है। हसन प्राकृतिक सौंदर्य की खोज कर रहा है, भले ही यहाँ का नजारा भी बेहद खूबसूरत और आनंददायक है,लेकिन यह नजारा ऐसा है जैसे किसी ने झील की सतह पर चांद को चमकते देखा हो। वह प्रतिबिंब है। असली चाँद झील में नहीं है।
असली चाँद किसने देखा? वह तो झील में चाँद देखने वाले को पागल ही कहेगा। प्राकृतिक सौंदर्य से कोई क्यों मुग्ध होगा? मूल सौंदर्य को खोजें जहाँ कुछ भी आभासी (virtual) नहीं है।
उसी मूल को खोजने का तरीका “ध्यान” है। अपने भीतर उतरने का साधन।
*"हृदय आधारित ध्यान के अभ्यास में हम अपने अस्तित्व के सरलतम और शुद्धतम पहलू की खोज करके उसकी अनुभूति करते हैं।"*
दाजी









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