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मौनव्रत: जरूरी या नही

मौनव्रत: जरूरी या नही

दिन के चौबीस घंटों में तुम्हें एक घंटा मौन रहना जरूरी है, जब भी तुम्हारी सुविधा हो। तुम्हारा आंतरिक संवाद चलता रहेगा लेकिन तुम उसके भागीदार मत बनो। बिना संलग्न हुए सुनो।
कुंजी यह है कि आंतरिक वार्तालाप को इस भांति सुनो जैसे दो व्यक्तियों को बोलते हुए सुनते हो। तटस्थ रहो।/संलग्न मत होओ, दिमाग का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को क्या बता रहा है इसे सुनो। जो भी आ रहा है उसे आने दो, उसे दबाओ मत; सिर्फ साक्षी रहो।
तुमने वर्षों से जो भी कूड़ा इकट्ठा किया है वह निकलेगा। दिमाग को कभी इस कचरे को बाहर फेंकने की इजाजत नहीं दी गई है। एक बार मौका मिलने पर मन ऐसे दौड़ेगा जैसे लगाम छूटने पर घोड़ा भागता है।उसे भागने दो।-तुम सिर्फ बैठो और अवलोकन करो। इस तरह सिर्फ देखना धीरज की कला है।
तुम उस घोड़े पर सवार होना चाहोगे, उसे दिशा देना चाहोगे, इधर या उधर क्योंकि यह तुम्हारी पुरानी आदत है। इस आदत को तोड़ने के लिए तुम्हें धीरज की जरूरत है।
मन जहां भी जाए उसे सिर्फ देखना। इसमें कोई व्यवस्था देने की कोशिश मत करना। क्योंकि एक शब्द से दूसरा शब्द पैदा होता है, और फिर तीसरा, फिर एक और, फिर हजारों, क्योंकि हर चीज एक दूसरे से जुड़ी है। जो मन में आए उसे जोर से बोलो यह सुविधापूर्ण है और संभव है। अपने विचारों को जोर से बोलो ताकि तुम भी उन्हें सुन सको, क्योंकि मन के भीतर विचार काफी सूक्ष्म होते हैं और हो सकता है तुम उन्हें न सुन सको। जोर से बोलो, उन्हें सुनो, और पूर्णतया सजग और सतर्क रहो ताकि तुम उनसे दूर रह सको।
मन में जो भी आता हो उसे बोलने का फैसला लो, लेकिन जरा भी पूर्वाग्रह न हो, तटस्थ रहो कि तुम्हारे और उनके बीच एक अलगाव हो। मन को खाली करना अत्यंत आवश्यक है, कम से कम छह महीने तक।
पूरे जीवन तुम उस पर विचारों का बोझ डालते आए हो। यदि तुम धैर्य पूर्वक और लगन से लगे रहे, तो सिर्फ छह महीने काफी हैं अन्यथा छह साल लग सकते हैं या छह जन्म!
*सब कुछ तुम पर निर्भर है कि तुम कितनी समग्रता से और ईमानदारी से इस विधि को करते हो। धीरे-धीरे, हल्के से तुमें मौन का पदचाप सुनाई देगा!

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