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दिव्यता (ईश्वर) कहाँ मौजूद है?

पढ़ने से पहले… धीरे से अपनी आँखें बंद करें… अपना ध्यान अपने हृदय पर ले आएं… हृदय की धड़कन को महसूस करें…

दिव्यता (ईश्वर) कहाँ मौजूद है?

एक बार ब्रह्मा (निर्माता) दुविधा में पड़ गए। कोई मनुष्य जब भी मुसीबत में पड़ता, तो वह भगवान के पास भाग-भाग कर आता है और उन्हें अपनी परेशानियाँ बताता, उनसे कुछ न कुछ माँगने लगता।

अत: उन्होंने इस समस्या के निवारण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- “देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूँ। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता है, जबकि मैं उन्हें उनके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हूँ। फिर भी थोड़े से कष्ट में ही मेरे पास आ जाते हैं। जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूँ, न ही तपस्या कर सकता हूँ। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएँ, जहाँ मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुँच सके।”

ब्रह्मा के विचारों का सम्मान करते हुए, देवताओं ने अपने विचार व्यक्त किए, कुछ ने कहा – “आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं।” सृष्टिकर्ता ने कहा- “यह स्थान मनुष्य की पहुँच के भीतर है। उसे वहाँ पहुँचने में अधिक समय नहीं लगेगा।”

किसी देवता ने सलाह दी कि, “आप समुद्र में छिप जाएं।” ब्रह्मा ने मना कर दिया और कहा, “मनुष्य गोता लगाना और खोजना सीख जाएगा।”

फिर कुछ ने सुझाव दिया- “आप अंतरिक्ष में चले जाएं।” ब्रह्मा ने कहा- “एक दिन मनुष्य वहाँ भी अवश्य पहुँचेगा।”

ब्रह्मा निराश होने लगे थे। वे मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है, जहाँ मैं शांतिपूर्वक रह सकूँ।”

अंत में एक देवता बोले- “प्रभु! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएँ। मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा।” ब्रह्मा को देवता का सुझाव पसंद आ गया। उन्होंने ऐसा ही किया और वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।

उस दिन से मनुष्य अपना दुःख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूँढ रहा है पर वे मिल नहीं रहें हैं।

परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर- “हृदय रूपी मन्दिर” में बैठे हुए ईश्वर को महसूस नहीं करता।

दिव्यता हमारे भीतर स्थित है। हमें बस अपने भीतर देखने की ज़रूरत है।

मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे?
मैं तो तेरे अंतर मेहूं “हमें जो कुछ भी चाहिए, एक प्रकाश-स्रोत के रूप में हमारे हृदय में पहले से ही मौजूद है। अपने भीतर जो आत्मा है उसकी पहचान करना सीखें।”*
दाजी  

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