लालाजी के विचार
आदमी वही है, जो हर परिस्थिति में ज़िन्दगी बिताने को तैयार है। संस्कारों का प्रभाव वातावरण में इस तरह व्याप्त है कि वह लोगों के विचारों को अक्षुब्ध नहीं रहने देता। यह हमारी ही गलती है। हमारी इच्छा – शक्ति इतनी दुर्बल हो गई है कि उसके सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है। कारण यह है कि लोगों को अपने विचारों को बिखरा कर रखने में मज़ा आता है। कोई आदमी किसी काम को पूरा करने के बाद भी उसकी ओर से निश्चिंत नहीं हो पाता।
मन की उलझन का
अब एक सवाल उठता है कि यह सब कैसे हासिल किया जा सकता है? उत्तर यह है कि वह ऐसे विशिष्ट व्यक्ति को जिसे वह पूर्ण समझता हो, ईश्वर का रूप माने और उससे प्यार करने लग जाये। फिर एक बात रह जाती है। प्यार की भावना कैसे पैदा की जाये? उत्तर है- सही आचरण और काम के द्वारा। प्रश्न फिर भी हल नहीं होता, क्योंकि एक संदेह फिर उठता है कि सही आचरण और काम की आदत कैसे पड़े? फिर उत्तर है- प्रार्थना और दूसरों के लिए सम्मान की भावना के द्वारा। एक और सवाल उठता है- इस दशा तक हम कैसे पहुँचें ? उत्तर है- अच्छी संगत में रहकर। संतो और भक्तों की कथाएँ पढ़ना भी इसमें शामिल हैं।
बिना किसी अभ्यास
के इच्छाशक्ति कैसे दृढ़ की जा सकती है? उत्तर है- किसी एक काम को महत्वपूर्ण मान लो और बाकी सबको गौण। सबसे पहले एक इच्छा मन में करनी चाहिए कि मुझे अपनी इच्छाशक्ति सबल बनानी है। तब उसे उस काम को हाथ में लेना चाहिए। कोई विरोधी विचार मन में नहीं आने देना चाहिए।










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