पाला पिंजरे मा सुगनवा,उड़ि बिहनवा जइहीं ना……
लोकमंगल संस्थान में जुटे कवि, कलाकारों ने बांधा समां।गीतों की प्रस्तुतियों में स्वर कोकिला को दी श्रद्धांजलि।
करछना।लोक कला,संगीत, साहित्य हमारे समाज को तार तार जोड़ते हुए अपनी परम्परा और संस्कृति की अलख जगाते हैं। लता जी केवल भारत ही नहीं संगीत की दुनिया में अपनी सुर साधना को लेकर समूचे विश्व की धरोहर हैं। नई पीढ़ी के संगीतकारों से उनसे प्रेरणा लेने की जरूरत है। लोकमंगल संस्थान रामपुर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान यह बातें संस्थापक और जागृति मिशन के संयोजक डॉ भगवत पाण्डेय ने कही।लोक कलाकार बृजेश तिवारी द्वारा प्रस्तुत देवी गीत के उपरांत चर्चित कलाकार श्यामलाल बेगाना ने श्रद्धांजलि गीत के दौरान कहा-पाला पिंजरे का सुगनवा,उड़ि विहनवा जइहीं ना। रामबाबू यादव के गीत,यहां पर लागे नहीं ठिकाना,एक दिन सबको जाना है और मोहिनी श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत लता जी के गीत, ए मेरे वतन के लोगों पर भी सभी भाउक हो उठे। वरिष्ठ लोक गायक बचऊ लाल यादव के बसंती गीतों ने खूब समां बांधी।प्राचार्य लोकविद् रामलोचन सांवरिया ने अपनी कविता,कवि कलाकार प्रयाग के,सब दे रहे श्रद्धांजलि,द्वारा स्वर कोकिला को श्रद्धा सुमन अर्पित किए।मोनू मस्ताना,मोहन जी पाण्डेय,त्रिभुवन नाथ गौड़,नेब्बू लाल और फूलचंद यादव ने भी मौसमी गीतों में सुर साम्राज्ञी को श्रद्धांजलि अर्पित की। सबरेज अहमद द्वारा प्रस्तुत गांव का गीत एवं संजय पाण्डेय सरस के वसन्त गीतों ने भी खूब तालियां बटोरी। जितेंद्र मिश्र जलजऔर फतेह बहादुर ऋषिराज ने भी अपने काव्य पंक्तियों से स्वर कोकिला को श्रद्धासुमनअर्पित किए। कार्यक्रम के संचालन के दौरान वरिष्ठ गीतकार राजेन्द्र शुक्ल ने लता जी की स्मृतियों को ताजा करते हुए उनके लोकजीवन और सादगी के चित्र उकेरे। इस मौके पर बृजेश द्विवेदी,बुद्धेश्वर आनंद,रणजीत सिंह,रामअवतार कुशवाहा,बसंत लाल,पुरुषोत्तम दास,शमशेर अली,राकेश कुमार चौधरी,अतुल तिवारी,विजयपाल मानिकचंद ओझा समेत कई कवि, कलाकार,साहित्यकार प्रबुद्धजन मौजूद रहे।











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