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अपनी संकल्प शक्ति को कैसे बढ़ाया जा सकता है?

अपनी संकल्प शक्ति को कैसे बढ़ाया जा सकता है?

अभ्यास

बात प्राचीन समय की है,एक गुरुकुल मे वरदराज नाम का एक बालक था । वह मंदबुद्धि था और इस कारण अन्य विद्यार्थियों के समक्ष अक्सर हँसी का पात्र बनता था।

गुरुकुल के प्रधानाचार्य अपनी तरफ से बहुत प्रयास करते थे ,परंतु निर्बल स्मरण शक्ति के कारण , वह जो कुछ भी याद करता ,उसे थोड़ी देर बाद ही भूल जाता था । काफी प्रयासों के बाद भी वह इस बार की परीक्षा मे अनुत्तीर्ण हो गया।

गुरुजी आखिर हार मान कर उससे बोले,”बेटा वरदराज मैंने सारे प्रयास करके देख लिए । अब यही उचित होगा कि तुम यहाँ अपना समय बर्बाद मत करो। अपने घर चले जाओ और अपने घर वालों की काम में मदद करो ।”

वरदराज ने भी सोचा कि शायद विद्या मेरे भाग्य में ही नहीं है और भारी मन से गुरुकुल छोड़कर अपने घर की ओर निकल गया। अनेकों प्रश्न उसके मन में उथल-पुथल मचाए हुए थे । कैसे वह अपने घर लौटेगा ? माता-पिता को जाकर क्या उत्तर देगा ? जब लोगो को पता चलेगा कि वह गुरुकुल मे पढ़ने लायक नहीं है, तब वह कैसे उनका सामना कर पाएगा? वरदराज भारी हृदय लिए अपने गाँव के पास तक आ पहुँचा था । लेकिन धूप बहुत तेज हो चली थी इसलिए उसने थोड़ा विश्राम करने का निश्चय किया।

गर्मी की इस तपती दोपहर में सूरज की तेज रोशनी सब को जला रही और भूख भी उसे बेहाल किए हुए थी। इसलिए वहीं एक वृक्ष के नीचे बैठकर सत्तू खाने लगा, जिसे वह गुरुकुल से साथ लेकर चला था । वहाँ पास ही एक कुएँ पर कई लोग खड़े थे। प्यास के मारे सब बेहाल थे । इसलिए बार-बार डेगची कुएँ में डालते और शीतल जल निकाल कर पीते । रस्सी के बार-बार रगड़ने से कुएँ के किनारे लगे पत्थर पर उस रस्सी की छाप बन गई थी। लोग जितना पानी निकालते जा रहे थे, उस पत्थर की छाप उतनी ही गहरी होती जा रही थी।

वरदराज चुपचाप बैठा यह सब देख रहा था । अचानक उसके मन में एक विचार आया। वह सोचने लगा यदि केवल जूट की बनी एक कोमल रस्सी इतने कठोर पत्थर पर अपनी छाप बना सकती है तो , मैं सफल क्यों नहीं हो सकता । आखिर मेरा दिमाग पत्थर से ज्यादा कठोर तो नहीं है।

वरदराज के मन में आशा की ज्योति जगमगा उठी । उस ठहराव के क्षण मे उसके भीतर की प्रेरणा जाग उठी। वह खड़ा हुआ और तुरंत ही उसने निश्चय किया कि वह वापस गुरुकुल लौट जाएगा और फिर से अध्ययन आरंभ करेगा । वह घर के समीप आ गया था, पर घर ना जाकर वापस गुरुकुल लौट आया।

उसके साथी उसे देखकर आश्चर्यचकित हो गए । उसकी बात सुनकर आचार्य ने पहले तो उसको गुरुकुल में रुकने से मना कर दिया। पर इस बार उसकी अंदर की इच्छा शक्ति जाग गई थी , उसके बहुत अनुनय विनय और प्रार्थना करने पर द्रवित होकर उसे गुरुकुल में दोबारा प्रवेश दे दिया। इस बार वरदराज ने अध्ययन में रात दिन एक कर दिए । उसके अभ्यास की लगन देखकर उसके आचार्यो ने भी उसे पूरा सहयोग दिया और जब परीक्षा का परिणाम आया तो संपूर्ण गुरुकुल स्तब्ध था । वरदराज ना केवल उत्तीर्ण हुआ था बल्कि उसने संपूर्ण विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया था।

एक समय जड़ बुद्धि समझा जाने वाला यह बालक, आगे चलकर संस्कृत का बहुत बड़ा विद्वान बना । उन्होंने कही अद्वितीय ग्रंथो की रचना की। उन्होंने लघु सिद्धांत कौमुदी, मध्य सिद्धांत कौमुदी ,सार सिद्धांत कौमुदी और मुग्ध बोध जैसे कई ग्रंथो की रचना की । छात्र उनका शिष्य बनना अपना गौरव समझते थे ।

पर यह किसी जादू से नहीं हुआ था। यह आश्चर्यजनक परिणाम उपजा था, संकल्प और अभ्यास की अमोघ शक्ति से। अभ्यास और प्रबल इच्छाशक्ति के बल पर ही यह असंभव कार्य संभव हुआ था ।

यदि हम किसी भी कार्य को करने का संकल्प कर लें तो, ऐसा कौन सा अवरोध है जो हमारे मार्ग में चट्टान बनकर खड़ा हो जाए। निसंदेह कुछ भी नहीं!

एक शुद्ध और शक्तिशाली संकल्प सर्वशक्तिमान है। पर *हर चीज़ का आरंभ अभ्यास से होता है। समय के साथ यह अभ्यास जीवनशैली बन जाता है और जीवनशैली नियति की ओर ले जाता है
*“पहले ही कदम पर लिए गए दृढ़ संकल्प को यदि अंत तक कायम रखा जाए तो वह पूर्ण सफलता प्राप्त करने में कभी विफल नहीं होगा।”* 
*बाबूजी*  

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