विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं
“यदि सुखकी इच्छा है तो “चरित्र”का निर्माण करिए
“धन की कामना है तो “आचरण” को ऊँचा करिए ।”
“स्वर्ग की वांछा है तो भी “चरित्र” को देवोपम बनाइए
और….
“यदि “आत्मा,” “परमात्मा” अथवा “मोक्ष-मुक्ति” की जिज्ञासा है तो भी “चरित्र” को आदर्श एवं उदात्त बनाना होगा ।” जहाँ “चरित्र” है वहाँ सब कुछ है, जहाँ “चरित्र” नहीं वहाँ कुछ भी नहीं ।
“चरित्र” की रचना “संस्कारों” के अनुसार होती है और “संस्कारों” की रचना “विचारों” के अनुसार । अस्तु “आदर्श चरित्र” के लिए, “आदर्श विचारों” को ही ग्रहण करना होगा । पवित्र, कल्याणकारी और उत्पादक विचारों को चुन-चुनकर अपने मस्तिष्क में स्थान दीजिए । अकल्याणकर दूषित विचारों को एक क्षण के लिए भी पास मत आने दीजिए । “अच्छे विचारों का ही चिंतन और मनन करिए ।” “अच्छे विचार वालों से संसर्ग करिए, अच्छे विचारों का साहित्य पढ़िए और इस प्रकार हर ओर से “अच्छे विचारों”से ओतप्रोत हो जाइए”
कुछ ही समय में आपके उन “शुभ विचारों” से आपकी एकात्मक अनुभूति जुड़ जाएगी, उनके चिंतन-मनन में निरंतरता आ जाएगी, जिसके फलस्वरूप वे “मांगलिक विचार” “चेतन मस्तिष्क” से “अवचेतन मस्तिष्क” में संस्कार बनकर संचित होने लगेंगे और तब उन्हीं के अनुसार आपका “चरित्र” निर्मित और आपकी क्रियाएँ स्वाभाविक रूप से आपसे आप संचालित होने लगेंगी । “आप एक “आदर्श चरित्र” वाले व्यक्ति बनकर सारे श्रेयों के अधिकारी बन जाएँगे।









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