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ईश्वर / खुदा के बंदे को कैसा होना चाहिए?’उबुदियाह’ (भाग-1 )

ईश्वर / खुदा के बंदे को कैसा होना चाहिए?
‘उबुदियाह’ (भाग-1 )

‘उबुदियाह’ का सरल शब्दों में अर्थ है- ईश्वर पर निर्भरता

‘अल-उबुदियाह’ में ईश्वर के प्रति दिल, ज़बान और अंगों की दासता और गुलामी शामिल है। दिल की गुलामी में दिल की सोच और दिल से की गई हरकतें, दोनों शामिल हैं।

तो, अल-उबुदियाह एक व्यापक शब्द है जिसका अर्थ है-
“हम आपकी ही उपासना करते हैं और केवल आप ही से हम सहायता माँगते हैं।”

यह एक गुलाम ‘अयाज’ की कहानी है, जो अपने मालिक के प्रति बहुत वफादार था। उसका मालिक एक धनी व्यापारी था।

दुर्भाग्य से, एक ऐसा समय आया कि धनी व्यापारी दिवालिया हो गया। कर्ज चुकाने के लिए उसे अपनी सारी संपत्ति बेचनी पड़ी। यहाँ तक कि उसके पास अपने दास अयाज के अलावा कुछ भी नहीं बचा और कर्ज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी उस पर बकाया था। दिक्कत को दूर करने के लिए अयाज ने अपने मालिक को ‘दास बाजार’ में उसे बेचने का सुझाव दिया।

इस पर उसके मालिक ने कहा, “मेरा कर्ज तुम्हारे मूल्य से बड़ा है, अयाज।”

अयाज ने अपने मालिक से उसे दस लाख दिरहम में बेचने के लिए कहा। उसके मालिक ने उसे यह कहते हुए मना कर दिया कि कोई भी उसे इतनी अधिक कीमत में खरीदने वाला नहीं है। लेकिन अयाज जिद करता रहा और अपने मालिक से उसे बेचने के लिए कहता रहा। यह जोर देते हुए कि उसके पास वो खासियत है, जो बाजार के अन्य दासों में नहीं हैं।

उसके मालिक ने कहा, “अयाज, मैं जानता हूँ कि तुम जवान, ताकतवर या सुंदर नहीं हो, तो फिर मुझे तुम्हारी कौनसी खासियत बतानी चाहिए?”

अयाज ने उत्तर दिया, “मालिक, खरीदारों से कहो कि अयाज गुलाम बनना जानता है। वह जानता है कि उबुदियाह का अर्थ क्या है।

मालिक ने इसे एक कोशिश के रूप में आजमाने का फैसला लिया। वह अयाज को गुलाम बाजार में ले गए और घोषणा की कि वह अपने गुलाम अयाज को दस लाख दिरहम में बेच रहें है।
उन दिनों एक गुलाम की कीमत 200-300 दिरहम से ज्यादा नहीं होती थी। जाहिर रूप से, बाजार के लोग उनका मजाक बनाने लगे।
जल्द ही, सूबे में सभी ने उनके बारे में बात करना शुरू कर दिया और खबर गजनी के सुल्तान महमूद के महल तक पहुँच गई।
अफवाह सुनकर उस समय के शासक सुल्तान महमूद गजनवी हैरान हो गए। उन्होंने गुलाम और मालिक को महल में बुलाया।
जब अयाज के साथ उनके मालिक, गजनवी के सामने पेश हुए तो सुल्तान ने उनसे पूछा, “तुम इस दास को इतनी ऊँची कीमत पर क्यों बेच रहे हो?” मालिक ने कहा, “ऐसा इसलिए है जनाब क्योंकि अयाज गुलाम बनना जानता है और यह जानता है कि उबुदियाह क्या है।”
गजनवी उनके जवाब से खुश हुआ और उसने दस लाख दिरहम जितनी बड़ी रकम देकर गुलाम को खरीद लिया।
उधर मालिक ने अपने पैसे लेकर महल छोड़ा और इधर गजनवी ने अपने सैनिकों को गुलाम को 100 कोड़े मारने का आदेश दिया।
जब वे कोड़े बरसा रहे थे, तो गजनवी ने अपने एक वज़ीर को गुलाम अयाज के पास जाकर उससे सुल्तान से रहम की, यह दुआ मांगने के को कहा “हे सुल्तान, आप मुझे क्यों मार रहे हो? मैंने क्या गलत किया है?” और वज़ीर ने ऐसा ही किया।
अपने नए मालिक से पूछने या रहम की भीख माँगने के बजाय, अयाज ने वज़ीर से कहा, “मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि सुल्तान मेरे मालिक है और मेरे मालिक ने मेरे साथ जो कुछ भी किया, मैं उसमें खुश हूँ।”
जब गजनवी को अपने वज़ीर के मार्फत अयाज के इस जवाब के बारे में पता चला, तो उसने कहा, “अगर यह उसका जवाब है, तो मैंने उसे बहुत सस्ते दाम पर खरीदा है।”
गजनवी अयाज से बेहद खुश था। उसने उससे पूछा, “अयाज, तुम किस तरह का खाना पसंद करोगे और किस तरह के कपड़े पहनना चाहोगे?”
अयाज ने उत्तर दिया, “जो कुछ भी मेरे मालिक मुझे खाने को देंगे, मैं उसे खाऊंगा और जो कुछ भी मेरे मालिक मुझे पहनने को देंगे, मैं उन्हें पहनूँगा।”
समय के साथ गजनवी को अपने गुलाम अयाज के गुणों पर इतना विश्वास हो गया कि उसने अयाज को अपने दरबार का वज़ीर ए खास बना दिया।
जब अयाज शक्तिशाली मुस्लिम शासक सुल्तान महमूद गजनवी का सबसे भरोसेमंद करीबी बन गया, तो कई दरबारी उससे जलने लगे। उन्होंने अयाज को उस हालात से नीचे गिराने की कोशिश करना शुरू कर दिया।
एक दिन, दो मंत्री सुल्तान महमूद गजनवी के पास आए और कहा, “अयाज ने बहुत सारे गहने और खजाना चुरा लिया है और उसने उन सभी चुराए सामान को एक कमरे में बंद कर रखा है। वह हर सुबह उस कमरे में जाता हैं और किसी और को उस कमरे के अंदर नहीं जाने देता हैं।”
यह सुनकर, गजनवी को अयाज के व्यवहार के बारे में शक हुआ और उसने अगली सुबह उस कमरे का दरवाजा तोड़ने और उसमें जो कुछ भी है, उसे उनके सामने पेश करने का फरमान जारी किया।
अगली सुबह सिपाहियों ने औजार लेकर दरवाजे का ताला तोड़ा, पर उन्हें वहाँ एक सूती चादर और एक जोड़ी चमड़े की पुरानी चप्पल के अलावा कुछ नहीं मिला। वे इस पर विश्वास नहीं कर सके और सोचा कि खजाने को जमीन में दफन दिया होगा, वरना अयाज को इस कमरे में केवल एक फटी हुई चादर और पुरानी चमड़े की चप्पलों को हर रोज देखने आने की क्या आवश्यकता रहती है? इसलिए उन्होंने कमरे के फर्श को भी खोद दिया। लेकिन अफसोस उन्हें वहाँ से भी कुछ नही मिला। उन्होंने इसके बारे में सुल्तान को खबर कर दी।
गजनवी ने अयाज को तलब किया और पूछा, “एक सूती चादर और एक जोड़ी चमड़े की चप्पल के अलावा, कमरे में और कुछ नहीं है, तो तुमने उस कमरे को बंद क्यों कर रखा और हर दिन तुम वहाँ अकेले क्या करने जाते हो?”
अयाज ने उत्तर दिया, “आपका गुलाम बनने से पहले, मैं वह कपड़े पहनता था। लेकिन आपकी हुजूरी में आने के बाद मुझे सब कुछ मिला। क्योंकि आदमी की फितरत अहसान फरोशी और बदगुमानी की होती है, इसलिए मैं बार-बार उस कमरे में जाता हूँ और अपनी पुरानी चादर देखता हूँ ताकि मैं घमंड में न पड़ जाऊँ। मैं रोज सुबह याद करता हूँ कि आज मेरे पास जो कुछ भी है, वह सुल्तान की कृपा से है और यह सब मुझे कर्ज के रूप में दिया गया है। उसके बाद ही मैं अपने दिन की शुरूआत करता हूँ।”
अयाज को अक्सर पूरी ईमानदारी के साथ प्रार्थना कहते हुए सुना गया, “हे मालिक! यह सब आपका है, मेरा नहीं। ये कपड़े आपके हैं, न कि मेरे। शरीर में ताकत, आँखों में रोशनी, सब आपके कारण हैं।” वह इस प्रार्थना के समय, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण में प्रेम के आँसू बहा रहा होता है।
अयाज के ये अल्फाज़, सुल्तान महमूद गजनवी के लिए तालीम थी। सारा किस्सा जानकर सुल्तान ने अयाज को गले लगाया और भरी आँखों से कहा, “अयाज, तुमने मुझे अच्छा सबक दिया है। यह वह सबक है जिसे हम सभी को सीखना चाहिए। चाहे हमारी स्थिति कुछ भी हो, ईश्वर, जिसके हम सभी बंदे हैं, उसके सामने हमें, उसकी कृपा को हमेशा याद रखना चाहिए। उसी ने हमें पैदा किया है, हमारी परवरिश की है और उसी ने हमारी जिंदगी में खुशियाँ बक्शी है।
डॉ.अल्लामा मोहम्मद द्वारा निम्नलिखित उर्दू दोहा इस बात पर जोर देता हैं कि कैसे ईश्वर किसी भी बिनाह पर, लोगों के बीच अंतर नहीं करता है।
उसके आगे सब बराबर और खास हैं।_ एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद और अयाज,
ना कोई बंदा रहा और ना कोई बंदा नवाज़,
बंदा-औ-साहेब-औ- मुहताज-औ-घनी, सब एक हुए,
_तेरी सरकार में पहुँचे तो सब एक हुए
“हमारी आत्मा और सबकी आत्मा, एक ही है।”
लालाजी महाराज

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