क्या हम अपने अस्तित्व को पहचानते हैं?
स्वर्णिम पक्षी
उपनिषद में एक बहुत ही सुन्दर कहानी का उल्लेख है। स्वर्ण पंख वाले दो पक्षी एक ही वृक्ष में निवास करते हैं।
वृक्ष के सबसे ऊपरी डाल पर बैठा पक्षी स्थिर, शांत भाव से अपनी ही महिमा में मस्त रहता है। वह इस वृक्ष के फलों को नहीं खाता है। वह अपने आनंद और सुख के लिए किसी बाहरी वस्तु पर अवलंबित नहीं रहता है। इच्छाओं और आवश्यकताओं से रहित, वह अपनी ही गरिमा में परिपूर्ण रहता है।
वृक्ष के मध्य भाग में बैठा पक्षी सदा चंचल रहता है। वह इस वृक्ष का कभी मीठा, तो कभी कड़वा फल खाता है। स्वाद चखने के लिए वह लगातार एक शाखा से दूसरी शाखा पर फुदकता रहता है। भूख से अतृप्त वह पक्षी मीठे फल की आकाँक्षा में हमेशा अधीर बना रहता है।
स्वादिष्ट और मीठा फल खाने पर उसे क्षणिक सुख और आनंद की अनुभूति होती है, लेकिन उसका यह सुख स्थाई नहीं रहता है; वह पुनः भूखा हो जाता है।
एक बार वह एक अत्यंत ही कड़वा फल खा लेता है, और विरक्त होकर कुछ स्थिर भाव से ऊपर वाले पक्षी की ओर देखता है। और उसकी ओर बढ़ने लगता है। लेकिन कुछ ऊपर चढ़ने के बाद वह फिर से सब कुछ भुलाकर मीठे फलों को चखने में व्यस्त हो जाता है।
ऐसा कई बार होता है। एक बार उसने बहुत ही कड़वा फल खाया, जिससे वह अत्यंत ही व्याकुल हो उठा। उसे गहरा आघात लगा, फलों से अब उसे विरक्ति हो गई। उसे अब और फल खाने की इच्छा नहीं होती थी। वह अब फलों के स्वाद से तृप्त हो गया और सीधे ऊपर वाले पक्षी की ओर उड़ान भरने लगा, और ऊपर वाले पक्षी के बिल्कुल नजदीक पहुँच जाता है।
स्वयंप्रकाशित ऊपर वाले पक्षी की स्वर्णिम आभा उसके उपर प्रतिबिंबित होने लगती है; जो उसे अपने आप में पूरी तरह से आवेष्ठित कर लेती है। उसका अलग अस्तित्व मिट जाता है और वह ऊपर वाले पक्षी में पूर्णतया विलीन हो जाता है।
उसे अब यह बोध हो जाता है कि दूसरा पक्षी कभी था ही नहीं, वह तो सर्वदा शांत रहने वाला ऊपर वाला पक्षी ही था।
“हम माया के जाल में बिना किसी निस्तार की आशा के तब तक फँसे रहते हैं ,जब तक हम इसके मूल में शाश्वत सत्य की ओर अपना ध्यान न मोड़ दें।”
बाबूजी












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