आइये जानते हैं क्यों मनाया जाता है वर्ष में दो बार श्री हनुमान जी का प्राकट्य दिवस ??
१- महर्षि वाल्मिकी जी द्वारा रचित रामायण एवं महर्षि वेदव्यास जी द्वारा रचित वायुपुराण के अनुसार हनुमान जी का जन्म कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मंगलवार के दिन,तुला राशि के सूर्य में, स्वाति नक्षत्र और मेष लग्न में हुआ था, जो दीपावली से एक दिन पूर्व मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी अथवा रूप चतुर्दशी के दिन आता है।
*यथा — १- *आश्विनस्यासिते पक्षे,स्वात्यां भौमे च मारुति:।*
मेषलग्नेऽञ्जनागर्भात् स्वयं जातो हर: शिव:।।
*२- *शुक्लादिमास गणनया कार्तिक कृष्ण: तुलार्के मेषलग्ने सायंकाले अतश्चतुर्दश्यां सायंकाले जन्मोत्सव:।।*
इस प्रमाण अनुसार श्री हनुमानजी महाराज जी का जन्मोत्सव कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को मनाया जाता है।
श्री हनुमान जी के जन्म के संदर्भ में शास्त्रों में दो अलग – अलग दिन होने की वजह से ही श्री हनुमान जी का जन्मोत्सव भी वर्ष में दो बार मनाया जाता है।इसमें भी विद्वानों एवं शास्त्रों में मत भेद है। देखें——
(क)- कृतिवास रामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार कार्तिक अमावस्या को श्री हनुमान जी का जन्म हुआ।,
(ख)- आनंद रामायण सारकाण्ड सर्ग – १३, श्लोक -१६२-१६३ के अनुसार श्री हनुमानजी जी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष एकादशी को मघा नक्षत्र में हुआ था। यथा–चैत्रे मासि सिते पक्षे हरिदिन्यां मघाभिधे।
नक्षत्रे स समुत्पन्नो हनुमान् रिपुसूदन:।।
(ग)-स्कन्दपुराण वैष्णव खंण्ड अध्याय -४०, श्लोक -४२-४३ के अनुसार श्री हनुमानजी का जन्म मेष राशि के सूर्य में पूर्णिमा तिथि को चित्रा नक्षत्र में हुआ था।
यथा-मेष संक्रमणं भानौ सम्प्राप्ते मुनि सत्तमा।
पूर्णिमाख्ये तिथौ पुण्ये चित्रानक्षत्र संयुते।।
प्रादुरासीत्तदा तां वै भाषमाणो महामणि:।
(घ)-आनन्द रामायण में ही कल्पभेद अनुसार श्री हनुमानजी का जन्म चैत्र मास शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि मंगलवार को हुआ था।
यथा-महाचैत्रीपूर्णिमायां समुत्पन्नोऽञ्जनीसुत:।
वदन्ति कल्पभेदेन बुधा इत्यादि केचन।।
२- चैत्र माह की पूर्णिमा को मनाएं जाने वाले श्री हनुमान जी के जन्मोत्सव के विषय में एक कथा प्रसिद्ध है—
एक दिन प्रात:काल वज्रांग बली अपनी निन्द्रा से जागे तो उन्हें बहुत तेज भूख लगी। उन्होंने माता अंजना को आवाज लगाई तो पता चला कि माता भवन में नही हैं। इसलिए वह स्वयं ही खाने के लिए कोई फल इत्यादि तलाशने लगे परन्तु उन्हें कुछ भी नही मिला।
इतने में उन्होंने झरोखे में से देखा तो सूर्योदय हो रहा था। उदय होता लाल वर्ण का सूर्य बाल हनुमान को स्वादिष्ट फल के समान प्रतीत हो रहा था। अतः वे उसे ही फल समझकर खाने चल दिए।
बाल केसरी नंदन की इस लीला को देखकर सभी देवी देवता आश्चर्यचकित हो गए एवं अत्यंत चिंतित भी हो गए क्योंकि देवताओं को अंदेशा था कि केसरी नंदन द्वारा सूर्यदेव को ग्रसने से पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
अतः देवराज इन्द्र ने यह देख अपने वज्र से केसरी नंदन पर प्रहार कर दिया जिससे केसरी नंदन मूर्छित हो गए।अपने पुत्र पर इन्द्र के वज्र प्रहार को देख पवनदेव को अत्यंत क्रोध आ गया और उन्होंने पृथ्वी पर वायु प्रवाह को रोक दिया। पृथ्वी पर वायु का प्रवाह रुकने से सभी जीवों को श्वास लेने में कठिनाई होने लगी और वे धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त होने लगे। यह सब देखकर इन्द्रादि देवता भगवान ब्रह्मा जी के पास गए और उन्हें सारा वृतांत बताया।
ब्रह्मदेव सभी देवतागणों सहित पवनदेव के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने केसरीनन्दन की मूर्छित अवस्था समाप्त कर उन्हें पुनः नव जीवन प्रदान किया तथा सभी देवता गणों को केसरी नंदन के जन्म के उद्देश्य को बताया एवं सभी देव गणों से आग्रह किया कि वे अपनी शक्ति का कुछ अंश केसरी नंदन को प्रदान करें जिससे भविष्य में उनके अवतरित होने का उद्देश्य सिद्ध हो सके।
सभी देवगणों ने अपनी शक्ति का कुछ अंश केसरी नंदन को दिया जिससे वे और अधिक शक्तिशाली हो गए।
उसी समय इन्द्र ने पवनदेव से अपने द्वारा की गई गलती के लिये क्षमा मांगी और कहा कि मेरे वज्र के प्रकोप से इस बालक की ठोड़ी टेढ़ी हो गई है, अत: मैं इसे यह आशीर्वाद देता हूँ कि यह पूरे विश्व में हनु (ठोड़ी) मान के नाम से प्रसिद्ध होगा।
और इस तरह से केसरी नंदन “हनुमान” नाम से प्रसिद्ध हुए।
तब से ही हनुमान जी के पुनः जन्म के इस दिवस को हम चैत्र माह की पूर्णिमा को भी “हनुमान जन्मोत्सव” के रूप मे मनाते हैं।
उक्त घटना चैत्र मास शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि को ही घटित हुई थी।
अतः जो भी समय मास एवं तिथियां कल्पभेद तथा शास्त्र भेद अनुसार श्री हनुमानजी के जन्म के संबंध में उपलब्ध होती है सभी को सत्य मानने में कोई आपत्ति नहीं है।
जब “नाना भांति राम अवतारा” और ” कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं” तो फिर हनुमान जी भी तो श्री राम के अवतार में सहायक बनकर प्रत्येक कल्प में अवतरित होते हैं। फिर तिथि,मास, और दिन में आश्चर्य कैसा। अतः जो-जो तिथियां, महीने एवं दिन में जिस भक्त की जैसी श्रद्धा भाव एवं विश्वास हो तथा जो लोक प्रचलित हो जिसे संत जन अधिक मान्यता देते उसे अपनी स्वेच्छा से स्वीकार करके श्री हनुमानजी महाराज का जन्मोत्सव मना सकते हैं।
।।जय श्री राम जय जय हनुमान।।
आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”
(ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र एवं वैदिक अनुष्ठानों के विशेषज्ञ)
संपर्क सूत्र – 09956629515
08318757871












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