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देब भूमी मे प्रदूषण की चपेट मै पतित पावनी नदिया

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जल प्रदूषण की चपेट में हैं चंपावत जिले की दो प्रमुख नदियां

  • नगरीय क्षेत्र में यकायक जन दवाब बढ़ने से गंडक और लोहावती का अस्तित्व खतरे में

ललित मोहन गहतोड़ी/के एन नैनवाल (उतराखंड)
भले केद्र सकार तामाम गंगा संरक्षण अभियान चलाये जा रहे है लेकिन सकार के नमामी गंगे अभियान की पोल खोलति नजर आती है प्रधान मंत्री के डीएम प्रोजक्जिट सिर्फ हवाई सावित हो रहे है गंगा का उदगम् प्रदेश उतराखड़ की गंगा की नदियो की सहायक चम्पावत जिले बहति आठ नदियों में से दो प्रमुख नदी जल प्रदूषण की चपेट में हैं. इन नदियों के प्रदूषित होने के चलते दोनों प्रमुख में जल संकट गहराता जा रहा है. नदियों का प्रदूषित जल पीने से यहां अधिकांश लोग पेट, आंत और दांत संबंधित बिमारियों की चपेट में आ रहे हैं. जबकि कालांतर में इन दोनों नदियों की शुद्धता को लेकर अपनी एक अलग पहचान रही है. लेकिन इन नदियों के प्रदूषण की चपेट में आने से जिले में जल संरक्षण के तौर तरीके पूरी तरह सिमटने लगे हैं.
चम्पावत जिले की प्रमुख नदियों में गंडक, कवैराला, लधिया, डगडुआ, काली, सरयू, पनार, लोहावती आदि शामिल हैं. इन नदियों के संरक्षण और संवर्धन को लेकर पिछले दो दशक में तमाम योजनाओं का खाका तैयार किया गया. जिले में निर्माण इकाई के अलावा सिंचाई, लघु सिंचाई, स्वजल, जलागम सहित कई अन्य एजेंसियां जल संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रही हैं. बावजूद इसके जल संरक्षण को लेकर उठाये गए तैयारियों के कदम आगे नहीं बढ़ पाए हैं. इधर जनसंख्या दवाब के चलते जिले की दो नदियां प्रदूषण की चपेट में हैं. नदियों में प्रदूषण की एकमात्र वजह इन नगरों में सीवरेज की व्यवस्था का नहीं होना है. दोनों नगरों में सीवर लाइन के नहीं होने से इन नगरों का सारा मलबा नगर के प्रमुख नालियों से होता हुआ सीधे नदी में जाकर मिल रहा है. एक तरफ चम्पावत की गंडक नदी भारी जन दबाव के चलते हांफ रही है तो दूसरी तरफ लोहाघाट स्थित प्रमुख लोहावती अपने वजूद को लगातार खोती जा रही है. लोहाघाट में 90 के दशक में लोहावती और चम्पावत की गंडक वर्ष 1997 में जिला गठन के बाद ही एकाएक बढ़ते जन दबाव से प्रभावित होने से दोनों प्रमुख नदियां प्रदूषण की चपेट में आ गयीं. प्रशासन के साथ साथ इन नगरों के जल चिंतकों सहित नदियों और प्राकृतिक स्रोतों को बचाने के लिए जुटे तमाम जल दूतों की नींद उड़ गई. वहीं इन प्रमुख नगरों के लिए ठोस नीति नहीं होने के चलते सीवेज नदियों में बहता प्रदूषण बनकर सामने आ रहा है. जल संरक्षण की कोई ठोस नीति नहीं होने से प्राकृतिक स्रोतों के अलावा नदियों की दशा लगातार खराब होती जा रही है. नगरों का सीवेज बहकर नदी में समाने से यहां नागरिकों को आंत और दांत संबंधित तमाम बिमारियों का सामना करना पड़ रहा है. जीवनदायिनी मानी जाने वाली दोनों प्रमुख नदियों में जम रही गाद का पानी पीने से अधिकांश लोग तमाम तरह के रोगों की चपेट में आ रहे हैं. इसके चलते जिले में नदियों और प्राकृतिक स्रोतों के संवर्धन के तौर-तरीके हासिये में सिमटकर रह गये हैं.

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नहीं मिली दूषित जल संबंधी स्पष्ट जानकारी
चंपावत: जंसंख्या दवाब के बाद जिले की दो प्रमुख नदियों गंडक और लोहावती के गंदे पानी का ट्रीटमेंट संबंधी और पिछले दो दशक से अब तक की जिले की प्रमुख नदियों की स्वच्छता और पानी स्थिति के संबंध में मौखिक रूप से जानकारी लेने के लिए संबंधित विभागों से संपर्क किया गया. लेकिन इस संबंध में स्पष्ट जानकारी किसी विभाग की ओर से नहीं मिली. पेयजल संस्थान, जल निगम, सिंचाई, लघु सिंचाई, स्वजल और जलागम जैसे संबंधित विभाग इस विषय को लेकर एक-दूसरे से जानकारी मिलने की बात कह अनभिज्ञता जताते नजर आए. वहीं जिला अस्पताल चंपावत के डाक्टरों की सलाह है कि इन दोनों प्रमुख नदियों का पानी जल प्रदूषण की चपेट में हैं और इसे हमेशा उबाल कर पीने के काम लाया जाना आवश्यक है. दूसरी ओर इन दोनों प्रमुख नगरों में जरूर कुछ जागरूक लोग यहां सीवर लाइन के लिए लामबंद होने लगे हैं जो एक अच्छा संकेत जरूर है.

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