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नज़र में हो 🪔

नज़र में हो 🪔

एक दिन सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी। जब सिद्धार्थ उठकर आया, दरवाजा खोला तो देखा, एक आकर्षक कद काठी का व्यक्ति चेहरे पर प्यारी-सी मुस्कान लिए खड़ा है।

सिद्धार्थ ने कहा “आप कौन हैं?”

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, “मैं वह हूँ, जिससे तुम प्रतिदिन प्रार्थना करते हो।”

सिद्धार्थ ने उलझन भरी निगाहों से जवाब दिया, “मुझे माफ कीजिए लेकिन मैं आपको पहचान नहीं पा रहा हूँ।”

तो वह कहने लगे, “भाई, मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें बनाया है। अरे ईश्वर हूँ… ईश्वर। तुम हमेशा कहते थे, नज़र में बसे हो पर नज़र नहीं आते, लो आ गया! अब आज पूरा दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।”

सिद्धार्थ ने चिढ़ते हुए कहा, “यह क्या मज़ाक है?”

“अरे मज़ाक नहीं है, सच है, सिर्फ तुम्हे ही नज़र आऊंगा। तुम्हारे सिवा कोई देख-सुन नहीं पायेगा मुझे।” उस व्यक्ति ने कहा।

इससे पहले कि सिद्धार्थ कुछ और कहता, उसकी माँ पीछे से आ गयीं और बोलीं, “अकेला ख़ड़ा-खड़ा क्या कर रहा है यहाँ। चाय तैयार है, चल आजा अंदर।”

अब उनकी बातों पर थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था और मन में थोड़ा-सा डर भी था। सिद्धार्थ जाकर सोफ़े पर बैठा, तो बगल में वह आकर बैठ गए।

उसकी माँ चाय लेकर आई। और जैसे ही चाय का पहला घूँट पिया, वह गुस्से से चिल्लाया “यार, यह चीनी कम नहीं डाल सकते हो क्या आप।”

इतना कहते ही उसे ध्यान आया, अगर ये सचमुच में ईश्वर हैं, तो इन्हें कतई पसंद नहीं आयेगा, कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। उसने अपने मन को शांत किया और समझा भी दिया कि भाई “तुम नज़र में हो आज” ज़रा ध्यान से।

अब सिद्धार्थ जहाँ भी जाता, वह शख्स हर जगह उसका पीछा करता।

खैर नहाकर, तैयार होकर वह पूजा घर में गया। यकीनन पहली बार उसने तन्मयता से रब को रिझाया क्योंकि आज उसे अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी।

फिर वह आफिस के लिए घर से निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा बगल वाली सीट पर महाशय पहले ही बैठे हुए हैं। सफर शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया और सिद्धार्थ फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया “तुम नज़र में हो।” उसने कार को साइड में रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते-करते कहने ही वाला था कि “इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे” पर ये तो गलत था, पाप था, तो रब के सामने कैसे कहता। तो एकाएक ही उसके मुँह से निकल गया, “आप आ जाइये आपका काम हो जाएगा आज।”

फिर उस दिन उसने आफिस में ना स्टाफ पर गुस्सा किया, ना किसी कर्मचारी से बहस की। 100-50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जाती थी मुँह से, पर उस दिन सारी गालियाँ “कोई बात नहीं, इट्स ओके” में तब्दील हो गयीं।

वो पहला दिन था जब क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द, बेईमानी, झूठ, ये सब उसकी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बने।

शाम को वह आफिस से निकला, कार में बैठा, तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया “प्रभु सीट बेल्ट लगा लो, कुछ नियम तो आप भी निभाओ।” उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी।

घर पर रात्रि भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार सिद्धार्थ के मुख से निकला, “प्रभु पहले आप लीजिये।” और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह में रखा।

भोजन के बाद उसकी माँ बोलीं, “पहली बार खाने में कोई कमी नहीं निकाली आज तूने, क्या बात है सूरज पश्चिम से निकला हैं क्या आज!”

उसने कहा, “माँ आज सूर्योदय पूरब से नहीं ह्रदय से हुआ है…रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ ! और प्रसाद में कोई कमी नहीं होती।”

थोड़ी देर टहलने के बाद वह अपने कमरे में गया, शांत मन और शांत दिमाग के साथ तकिये पर अपना सिर रख दिया। तब भगवान ने प्यार से सिद्धार्थ के सिर पर हाथ फिराया और कहा “आज तुम्हें नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है।”

सिद्धार्थ की गहरी नींद गालों पर थपकी से उड़ गई “कब तक सोएगा?! जाग जा अब,आज दीपावली है”
माँ की आवाज़ थी।

सपना था शायद, हाँ सपना ही था, अब समझ आ गया उनका इशारा। उसने सोचा – तुम नज़र में हो..

वह हर पल नज़र मैं है… इस सपने ने सिद्धार्थ को हर पल जागरूकता का अहसास करा दिया।आज उसका ह्रदय दिव्य प्रकाश से भर गया। नम आँखों से उसने माँ को कहा “माँ हैप्पी दीपावली

“क्षण-प्रतिक्षण, हर एक कदम पर अपने भीतर झाँकने, मेरी कमियों को देखने और उन्हें सुधारने के लिए मुझे साहसी होना होगा।”
दाजी

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