जब कुछ नहीं था तब क्या था?
कुछ नहीं (nothing} की शक्ति
एक बार की बात है, एक छोटी-सी चिड़िया थी जो उड़ने से बहुत डरती थी। उसकी माँ उसे उड़ने के लिए प्रोत्साहित करती रहती थी और चाहती थी कि वह कम से कम अपने पंख फड़फड़ाने लग जाए।
जब अन्य छोटी चिड़ियाओं ने अपने पंखों को फड़फड़ाना शुरू कर दिया और वे उड़ने की कोशिश करने लगीं तो वह छोटी-सी चिड़िया अपने घोंसले में बैठकर उन छोटी चिड़ियाओं को उड़ते देखती रहती थी।
एक रात जब उस छोटी-सी चिड़िया को नींद नहीं आ रही थी तो वह सोचने लगी कि इन पेड़ों के परे क्या हो सकता है।
“माँ, इन पेड़ों के परे क्या है?” उसने अपनी माँ से पूछा।
माँ अर्द्ध निंद्रा की हालत में ही बोली, “कुछ नहीं। अब सो जाओ।”
“कुछ नहीं!” छोटी चिड़िया को य़ह सुनकर बहुत ही आश्चर्य हुआ और इस कारण से वह सोचना बंद नहीं कर सकी और सोचती रही कि इन पेड़ों के परे क्या होगा।
अगली सुबह वह नन्ही-सी चिड़िया अपने घोंसले से निकल कर के कहीं चली गई और यह जानकर के अन्य सभी चिड़ियाओं को बहुत हैरानी हुई।
नन्ही चिड़िया कुछ नहीं की तलाश में चलती रही।
रास्ते में उस छोटी-सी चिड़िया को बहुत बड़ी नदी, रंग बिरंगे फूल, सुंदर दृश्य देखने को मिले और वह रास्ते में पक्षियों और जानवरों से भी मिली।
चलते हुए उस छोटी-सी चिड़िया ने अचानक रंग-बिरंगे पक्षियों के एक झुंड को उड़ते हुए उसकी तरफ आते देखा। उन रंग-बिरंगे पक्षियों के झुंड ने नन्ही चिड़िया से पूछा, “तुम क्या ढूँढ रही हो?”
“कुछ नहीं”, नन्ही चिड़िया ने उत्तर दिया।
“तो हमारे साथ आओ।” और नन्ही चिड़िया भूल गई कि उसे उड़ने में डर लगता है। उसने भी अपने पंख फैलाए और रंग-बिरंगे पक्षियों के झुंड के साथ ऊँची उड़ान भरने लगी।
जब वह छोटी-सी चिड़िया घर लौटी तो उसकी चिंतित माँ ने पूछा, “तुम कहाँ थीं? तुमने क्या देखा? ऐसा क्या हुआ कि तुम इतनी अच्छी तरह उड़ने लगीं?”
“कुछ नहीं!” छोटी चिड़िया ने खुशी-खुशी अपने पंख फड़फड़ाते हुए कहा।
“कुछ नहीं” कुछ भी और सब कुछ संभव बनाता है। हर बार जब हम किसी परेशानी में फंसते हैं, तो यह हमारे जीवन को फिर से बनाने का सबसे शक्तिशाली उपकरण है।
हम केवल इतना ही जानते हैं कि हम कुछ भी नहीं जानते हैं और यही मानव ज्ञान की पराकाष्ठा है।
संदर्भ: War and peace, Leo Tolstoy
*"सृष्टि का निर्माण होने से पहले 'कुछ नहीं' (Nothing) था, तब ब्रह्मांड में पूर्ण संतुलन था; केवल पूर्ण संतुलन। यही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। ईश्वर का सृजन, शून्य से ही हुआ था। अभ्यास के माध्यम से, जब आप उस मूल स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं जो सृष्टि से पहले थी, इसका मतलब है कि आप श्रेष्ठ हो रहे हैं।"*
दाजी












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