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ऐसी स्थति में हम क्या करते?

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मित्रता

एक बार की बात है, एक पिता और पुत्र एक साथ पार्क में घूम रहे थे और बातचीत करते हुए सुबह की हवा का आनंद ले रहे थे। वे दोनों पार्क में घूमते हुए काफी दूर तक चले गए थे कि अचानक पिता ने कहा, “बेटा, रुको!”

बेटे ने कहा, “क्या हुआ? आपने रुकने के लिए क्यों कहा?”

पिता ने कहा, “कुछ खास नहीं, लेकिन अब इस सड़क पर और आगे नहीं चलते हैं।”

“क्यों पिता जी?” बेटे ने आश्चर्य से पूछा।

“क्या तुम उन बुज़ुर्ग को हमारी ओर आते हुए देख रहे हो?” पिता ने सड़क की ओर इशारा करते हुए पूछा।

“हाँ, मैं उन्हें देख पा रहा हूँ। वह हमारी तरफ ही आ रहे हैं।” बेटे ने उत्तर दिया।

“वह मेरे मित्र हैं,” पिता ने कहा। “उन्होंने मुझसे पैसे उधार लिए थे लेकिन अब वह उसे वापस नहीं कर पा रहें हैं। जब भी वह मुझ से मिलते हैं तो मुझसे कहते है कि वह मुझे पैसे वापिस करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। अगर वह पैसो का इंतजाम नहीं कर पाए तो किसी और से पैसे उधार ले कर के मुझे दे देंगे। जब भी वह मुझसे यह बात कहते हैं तो उनकी आँखे शर्म से झुक जाती हैं। यह सिलसिला बहुत लंबे समय से चल रहा है लेकिन अब मैं अपने मित्र को ओर शर्मिंदा नहीं करना चाहता हूँ।”

बेटे ने कहा, “पिताजी, अगर आप अपने मित्र को और शर्मिंदा नहीं करना चाहते हैं, तो आप क्यों नहीं कह देते कि आपने उन्हें जो पैसा दिया था, वह उसे एक उपहार के रूप में स्वीकार कर लें क्योंकि आप उनसे वह पैसा वापस नहीं लेना चाहते हैं?”

पुत्र की बात सुनकर पिता ने कहा, “मैं अपने मित्र से पहले ही यह बात कह चुका हूँ। मैं कह चुका हूँ कि मुझे पैसे वापिस नहीं चाहिए। तुम इन पैसों को एक उपहार के रूप में स्वीकार कर लो। लेकिन मेरी यह बात सुनकर मेरा मित्र एकदम बौखला गया था।” उसने बहुत ही दुःखी और भारी मन से मुझसे कहा, ‘ मैं भिखारी नहीं हूँ। मैं तुम्हारा मित्र हूँ। जब मुझे जरूरत थी, तुमने मुझे पैसे दिए और अब जब भी मेरे पास पैसे आयेंगे मैं तुमको पैसे वापिस कर दूँगा। मैं तुम्हारा मित्र बन कर रहना चाहता हूँ, भिखारी नहीं बनना चाहता। “

पिता ने आगे कहा, “अब मैं उसे और शर्मिंदा नहीं करना चाहता हूँ और अपने दोस्त को शर्मिंदा होते देखते हुए मैं खुद भी शर्मिंदा नहीं होना चाहता हूँ। इस कारण से हम इस रास्ते से न जाकर किसी दूसरे रास्ते से चलते हैं।”

बेटे ने कहा, ” पिताजी, आप बहुत ही अच्छे हैं। आमतौर पर उधार लेने वाला व्यक्ति, क़र्ज़ देने वाले से बचने की कोशिश करता है, ना कि इसका उल्टा। आमतौर पर उधार लेने वाला शर्मिंदा होता है, ना कि देने वाला। लेकिन आप अपने मित्र को शर्मिंदगी से बचाना चाहते हैं। पिता जी मुझे आप पर बहुत ही गर्व है। मैं भी बड़ा होकर आपके जैसा बनना चाहता हूँ!

एक दयालु हृदय दूसरों को सबसे पहले रखता है और अजनबियों के साथ भी असुविधा या बलिदान के बारे में नहीं सोचता, क्योंकि दूसरों की मदद करना अपने स्वभाव के प्रति सच्चा होना है।

“दो सबसे महत्त्वपूर्ण गुण जो हमें इंसान बनाते हैं, वे हैं-दूसरों के साथ उदारता और करुणामयी भावना और व्यवहार।”
दाजी

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