जुमई खां की रचनाओं में धड़कता हैआम आदमी के जीवन का यथार्थ : अशोक
करछना। अवधी भाषा के रचनात्मक परिदृश्य में आम आदमी के लोक जीवन का यथार्थ बोध कराने वाली रचनाओं को लेकर जुमई खां आजाद की रचना धर्मिता का साहित्य समाज सदैव कायल रहेगा। अपने समय में दिखावे से दूर खुद एक अल्हड़ जीवन के पर्याय रहे जुमई खां की रचनाओं में वंचित,शोषित उपेक्षित समाज के प्रति जहां एक ओर गहरी पीड़ा का भाव झलकता है,वहीं बाबा नागार्जुन, मुंशी प्रेमचंद,और धूमिल जी की सोच और प्रेरक अभिव्यक्ति से ताल मिलाकर वह सदैव समकालीन कविता के एक स्तंभ के रूप में जाने जाते रहेंगे।उनका असली मूल्यांकन अभी शेष है। यह बातें जुमई खां की जयंती परआकाशवाणी दूरदर्शन से बतौर कार्यक्रम प्रस्तोता के रूप में जुड़े,चर्चित हास्य कवि अशोक बेशरम ने एसीआईटी साधुकुटी में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कही। उन्होंने कहा कि निर्धनता,भय,भूख, असुरक्षा,निरक्षरता,बेकारी जैसी समस्याओं को लेकर दलित पीड़ित,आश्रित,विवश,शोशित,आम आदमी के लोकजीवन का यथार्थ ही जुमई खां की कविताओं में प्रधान रहा। एक सचेतक और प्रेरक लोककवि के रूप में उनकी रचनाएं सर्व समाज को सदैव चिंतन के लिए विवश करती रहेंगी।उनकी बहुचर्चित कविता,कथरी तोहार गुन उइ जानइ,जे करै गुजारा कथरी मा,आज भी लोगों की जुबान पर रची-बसी है। आज के बदलते कविता साहित्य के इस दौर में बांचिक परंपरा से दूर मंचों पर जब जुमले,चुटकुले,तुकबंदियां कुलेल रही हों,आयअर्जन की परिधि में कुछ तथाकथित कवि विरदावलियों की रेस में हों और
नई पीढ़ी जोरदार तालियों की चाह में,तो ऐसे माहौल में खास तौर से अपनी अवधी बोली बानी के कार्य सर्जना में काका हाथरसी,पढ़ीस जी,काका बैसवारी,आद्या प्रसाद मिश्र उन्मत्त,जुमई खां आजाद जैसे लोक कवियों से प्रेरणा लेने की जरूरत है। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ लोककलाकार रामअवध यादव ने की। इस मौके पर नवोदित कवि और एसीआईटी के छात्र मौजूद रहे।














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