हुक्म नामा
दरबार साहिब श्री अमृतसर
दिनांक १३-०७-२०२२
सोरठि महला ५ ॥
ठाढि पाई करतारे ॥ तापु छोडि गइआ परवारे ॥ गुरि पूरै है राखी ॥ सरणि सचे की ताकी ॥१॥ परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥ सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥ हरि हरि नामु दीओ दारू ॥ तिनि सगला रोगु बिदारू ॥ अपणी किरपा धारी ॥ तिनि सगली बात सवारी ॥२॥ प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥ हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥ गुर का सबदु भइओ साखी ॥ तिनि सगली लाज राखी ॥३॥ बोलाइआ बोली तेरा ॥ तू साहिबु गुणी गहेरा ॥ जपि नानक नामु सचु साखी ॥ अपुने दास की पैज राखी ॥४॥६॥५६॥
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य का रखवाला परमात्मा खुद बन जाता है, उसका मन सदा के लिए सुखी हो जाता है क्योंकि उसके अंदर एक छिन में आत्मिक अडोलता के सुख और शांति पैदा हो जाते हैं। रहाउ। हे भाई! जिस मनुष्य के अंदर करतार ने ठंड बरता दी, उसके परिवार को उसकी ज्ञानेन्द्रियों को विकारों का ताप छोड़ जाता है। हे भाई! पूरे गुरू ने जिस मनुष्य की मदद की, उसने सदा कायम रहने वाले परमात्मा का आसरा देख लिया।1। हे भाई! विकार रोगों का इलाज करने के लिए गुरू ने मनुष्य को परमात्मा का नाम-दवा दी, उस नाम-दवाई ने उस मनुष्य के सारे ही विकार- रोग काट दिए। जब प्रभू ने उस मनुष्य पर मेहर की, तो उसने अपनी सारी जीवन कहानी ही सुंदर बना ली अपना सारा जीवन ही सँवार लिया।2। हे भाई! प्रभू ने सदा ही अपने प्यार करने वाले मूल प्राकृतिक स्वभाव बिरद को याद रखा है। वह हम जीवों के कोई भी गुण-अवगुण दिल से लगा के नहीं रखता।प्रभू की कृपा से जिस मनुष्य के अंदर गुरू के शबद ने अपना प्रभाव डाला, शबद ने उसकी सारी इज्जत रख ली उसको विकारों के जाल में फंसने से बचा लिया।3। हे प्रभू! तू हमारा मालिक है, तू गुणों का खजाना है, तू गहरे जिगरे वाला है। जब तू प्रेरणा देता है तब ही मैं तेरी सिफत-सालाह कर सकता हूं। हे नानक! सदा स्थिर प्रभू का नाम जपा कर, यही सदा हामी भरने वाला है। प्रभू अपने सेवक की सदा इज्जत रखता आया है।4।6।56।












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