प्रेरक विचार
ह्रदय की गहराई में उतरकर देखें, क्या सच में कोई बुरा इंसान है, इस संसार में ?
फकीर का कम्बल
एक दिन एक फकीर के घर रात को कुछ चोर घुस आये। घर में कुछ भी न था। सिर्फ एक कंबल था, जो फकीर ओढ़े लेटा हुआ था। सर्द रात, फकीर रोने लगा क्योंकि घर में चोर आए और चुराने को कुछ नहीं है, इस पीड़ा से रोने लगा।
उसकी सिसकियाँ सुन कर चोरों ने पूछा कि, “भई क्यों रोते हो?” फकीर बोला कि, “आप आए हैं-जीवन में पहली दफा, यह सौभाग्य तुमने दिया! मुझ फकीर को भी यह मौका दिया!
लोग फकीरों के यहाँ चोरी करने नहीं जाते, सम्राटों के यहाँ जाते हैं। तुम चोरी करने यहाँ आए, तुमने मुझे सम्राट बना दिया।
ऐसा सौभाग्य! लेकिन फिर मेरी आँखें आँसुओं से भर गई, सिसकियाँ निकल गई, क्योंकि घर में कुछ है नहीं। तुम अगर जरा दो दिन पहले खबर कर देते तो मैं इंतजाम कर रखता। दो-चार दिन का समय होता तो कुछ न कुछ मांग-तूंग कर इकट्ठा कर लेता।
अभी तो यह कंबल भर है मेरे पास, यह तुम ले जाओ और देखो इनकार मत करना। इनकार करोगे तो मेरे हृदय को बड़ी चोट पहुँचेगी।”
चोर घबरा गए, उनकी कुछ समझ में नहीं आया। ऐसा आदमी उन्हें कभी मिला नहीं था। चोरी तो जिंदगी भर की थी, मगर ऐसे आदमी से पहली बार मिलना हुआ था। पहली बार उनकी आँखों में शर्म आई और पहली बार किसी के सामने नतमस्तक हुए, मना नहीं कर सके।
मना करके इन्हें क्या दुख देना, कंबल तो ले लिया। लेना भी मुश्किल! क्योंकि इस के पास कुछ और है भी नहीं, कंबल छूटा तो पता चला कि फकीर निर्वस्त्र है। कंबल ही ओढ़े हुए था, वही एकमात्र वस्त्र था-वही ओढ़नी, वही बिछौना।
लेकिन फकीर ने कहा, “तुम मेरी फिकर मत करो, मुझे ऐसे रहने की आदत है। फिर, तुम आए, सर्द रात, कौन घर से निकलता है। कुत्ते भी दुबके पड़े हैं। तुम इसे ले जाओ और दुबारा जब आओ मुझे खबर कर देना।”
चोरो की हालत तो अजीब-सी हो गई और एकदम निकल कर झोपड़ी से बाहर हो गए। जब बाहर हो रहे थे, तब फकीर चिल्लाया कि, “सुनो, कम से कम दरवाजा बंद करो और मुझे धन्यवाद दो।” “अजीब आदमी है” चोरों ने सोचा।
कुछ ऐसी कड़कदार उसकी आवाज थी कि उन्होंने उसे धन्यवाद दिया, दरवाजा बंद किया और भागे।
फकीर खिड़की पर खड़े होकर दूर जाते उन चोरों को देखता रहा।
थोड़े दिन बाद वे चोर पकड़े गए। अदालत में मुकदमा चला, वह कंबल भी पकड़ा गया और वह कंबल तो जाना-माना कंबल था। वह उस प्रसिद्ध फकीर का कंबल था।
मजिस्ट्रेट तत्क्षण पहचान गए कि यह उस फकीर का कंबल है। “तो तुमने उस फकीर के यहाँ से भी चोरी की है?” मजिस्ट्रेट ने कहा।
फकीर को बुलाया गया और मजिस्ट्रेट ने कहा कि, “अगर फकीर ने कह दिया कि यह कंबल मेरा है और तुमने चुराया है, तो फिर हमें और किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। उस आदमी का एक वक्तव्य, हजार आदमियों के वक्तव्यों से बड़ा है। फिर जितनी सख्त सजा मैं तुम्हें दे सकता हूँ दूंगा।”
चोर तो घबरा रहे थे, काँप रहे थे। जब फकीर अदालत में आया और आकर मजिस्ट्रेट से कहा कि “ये लोग चोर नहीं हैं, ये बड़े भले लोग हैं। मैंने कंबल भेंट किया था और इन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था और जब धन्यवाद दे दिया, बात खत्म हो गई। मैंने कंबल दिया, इन्होंने धन्यवाद दिया। इतना ही नहीं, ये इतने भले लोग हैं कि जब बाहर निकले तो दरवाजा भी बंद कर गए थे।”
मजिस्ट्रेट ने तो चोरों को छोड़ दिया, क्योंकि फकीर ने कहा, “इन्हें मत सताओ, ये प्यारे लोग हैं, अच्छे लोग हैं, भले लोग हैं।”
चोर फकीर के पैरों पर गिर पड़े और उन्होंने कहा, “हमें दीक्षित करो।” वे सन्यस्त हुए और फकीर बाद में खूब हँसा और उसने कहा कि, “तुम संन्यास में प्रवेश कर सको इसलिए तो कंबल भेंट दिया था। इसे तुम पचा थोड़े ही सकते थे। इस कंबल में मेरी सारी प्रार्थनाएँ बुनी थीं।”
“झीनी-झीनी बीनी रे चदरिया” उस फकीर ने कहा, “प्रार्थनाओं से बुना था इसे। इसी को ओढ़ कर ध्यान किया था। इसमें मेरी समाधि का रंग था, दिव्यता की सुगंध थी। तुम इससे बच नहीं सकते थे। यह मुझे पक्का भरोसा था, कंबल ले ही आएगा तुमको। उस दिन चोर की तरह आए थे, आज शिष्य की तरह आए हो। मुझे भरोसा था। क्योंकि इस संसार मैं बुरा कोई आदमी है ही नहीं।”
“यह प्रेम ही है जो हमारे अंदर बदलाव लाता है, बेहतरी के लिए बदलाव। हर समय अपने हृदय में प्रेममय वातावरण बनाए रखना हमें बेहतर इंसान बना देता है।”
*दाजी












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