अवधी गीतों में रचा-बसा है संस्कृति परम्परा का लोकरंग:अशोक
नए लोककलाकार और रचना धर्मियों को अपनी यह थाती सहेजना जरूरी…
करछना।अवधप्रांत से जाने जाने वाले एक वृहद परिक्षेत्र में कभी लोकगीतों की समृद्ध परम्परा रही है। इन्हीं गीतों में हमारी लोक संस्कृति,संस्कार, लोकाचार,
लोकपरंपरा और माटी का लोकरंग रचा बसा है। आज खड़ी बोली की आपाधापी में नई पीढ़ी को चाहिए कि सर्जना के स्तर पर ऐसे गीतों को सहेजते हुए अपनी पहचान कायम रखें। विगत कई वर्षों से आकाशवाणी और दूरदर्शन में बतौर प्रस्तोता माटी के गीतों के बदलते लोकरंग पर शोध कर रहे चर्चित हास्य कवि अशोक सिंह बेसरम ने ऐसे गीतों को सीमटने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि हमारे समाज में कभी पुजहाई,विवाह पुंसवन उपनयन,जनेऊ,सोहर,सोहाग,नेहछू,परछन,शगुन,माइन,माडौ़,घाटो, सोहगैली,गारी,बेलनहाई,विदाई जैसे संस्कार गीतों के अलावा तेलियागीत,धोबियागीत,चंवरनाव,नौवाझक्कड़,चनैनी,पितमां,कंहरा,कहरउआ,मल्लहिया,घसियारा,कुलदहकी,पंचरा,पंवारा,बैसवारा खड़ीबिरहा,बंनजोरवा, सरौनी,जैसे जातिगत गीतों का चलन रहा है। इसके अलावा भी वर्षा ऋतु के मौसम में कजरी, रोपनी,झूमर आल्हा,पुरबी,मल्हार और बासन्ती मौसम में बसंती,उलार धमार,फगुआ,गलियारा,
बारहमासा,डेढ़ताल,ढाईताल,
चौताल,बेलवार,बेलवरिया,चैता चैती, जैसे बोली के लोकप्रिय गीतों में प्रेम,विरह,अनुहारमनुहार उल्लास रीति,प्रीति,नीति,राग, विराग का लोकरंग रचा बसा रहा।
आज रीमिक्स के इस दौर में बीते 3 दशकों से पांवपसारते खड़ी बोली के गीतऔर फिल्मीधुन तर्ज पर बहकती युवा पीढ़ीअपने ऐसे गीतों की परंम्परा के प्रति बेपरवाह सी लग रही है। हालांकि बुजुर्ग लोक कलाकारों ने समय दर समय ऐसे गीतों की प्रस्तुतियों से अतीत की परंपरा को जरूर सहेजा है किंतु नई पीढ़ी के रचना धर्मी और लोक कलाकारों को चाहिए कि ऐसे गीतों की तालीम लेकर इन्हें संजीदा बनाए रखें जिससे आने वाले समय में अपने गीतों के अतीत की पहचान हमारे अवध की लोकसंस्कृति,पुरखों के संस्कारऔर अवधी बोली के लोकरंग को सहेजते भी अपनी पहचान कायम रख सके।













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