*कहानी कलैवानी की….
कल हमने देखा कि कैसे वॉशिंग्टन पोस्ट के उन पत्रकार को एहसास हुआ, कि उन्होंने किताब-घर में उस लड़की का रंग-रूप देखकर उसके बारे में गलत धारणा बना ली थी। अब, आगे की वार्ता….
“मैडम, मुझे वास्तव में कल तक यह भी पता नहीं था कि ‘तत्व बोध’ किसने लिखा है। मैंने अभी कुछ दिन पहले इस विषय पर एक व्याख्यान में भाग लिया था, और उस व्याख्यान से प्रभावित हो कर मेरे मन में इस विषय के बारे में और जानने की जागरूकता पैदा हुई।”
“क्या आप भारतीय विद्या भवन में गोदा वेंकटेश्वर शास्त्री के व्याख्यान में शामिल हुए थे?” कलैवानी ने पूछा।
“हे भगवान! तुम्हें कैसे पता चला?”
“वे नियमित रूप से ऐसे विषयों पर कक्षाएँ लेते है। वास्तव में वे ऐसे विषयों पर व्याख्यान करने में शहर के सर्वश्रेष्ठ व्याख्याताओं में से एक हैं।”
मैंने उत्सुकता से उस लड़की से पूछा, “आप ऐसे विषयों में रुचि रखती हैं?”
“हाँ सर, मैंने स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण के बारे में बहुत कुछ पढ़ा है और संयोग से ‘तत्व बोध’ मेरा पसंदीदा विषय है।”
“आपके कहने का मतलब है कि आपने ‘तत्व बोध’ पढ़ा है?”
“मैंने इसके बारे में शिवरामन द्वारा लिखी पुस्तक को पढ़ा है और एक बार जब आप इसे पढ़ लेंगे, तो आपको इस पुस्तक को टेबल पर रखने का बिल्कुल भी मन नहीं करेगा..”
“क्यों इस पुस्तक में इतना अच्छा क्या है?” मैंने उत्सुकता से पूछा।
“सर, आप जरूर मज़ाक कर रहें है कि आप ‘तत्व बोध’ के बारे में नहीं जानते..”
“सच में, मैं अपनी अज्ञानता को स्वीकार करता हूँ..।” मैंने बहुत ही विनम्रता के साथ कहा।
मेरी पत्नी कोने में खड़े हो कर सब देख रही थी और साथ में अपने सीडी संग्रह को भी निहार रही थी..
“महोदय, मेरे अनुसार यदि आप इसे पढ़ते हैं तो यह संपूर्ण वेदांत का सार देता है और इसको पढ़के व्यक्ति जीवन में थोड़ा और विनम्र हो जाता है, और कह सकते हैं कि हमेशा के लिए अहंकार को छोड़ देता है।”
“क्या यह सच है कि इस साधारण सी किताब को पढ़कर कोई इतना विनम्र हो सकता है?” मैंने आश्चर्य से पूछा।
“बेशक, अगर कोई इस किताब के एक-एक शब्द में पूरी तरह से डूब जाए…लेकिन इसके लिये जरूरी है कि उसके अंदर दृढ़ विश्वास और भक्ति की भावना हो।”
तभी मेरी पत्नी भी हमारी बातचीत में शामिल हो गई और उसे उस लड़की के प्रतिभाशाली और बुद्धिमान होने का एहसास हुआ।
उसने मुझसे कहा, “आप वाशिंगटन पोस्ट के लिए इनका साक्षात्कार क्यों नहीं लेते। आप हमेशा पैरिस हिल्टन के बारे में ही क्यों सोचते हैं?”
मुझे भी लगा कि मेरा उस लड़की पर कुछ उधार बकाया है। मैंने उससे पूछा, “क्या तुम साक्षात्कार के लिए कुछ समय निकाल सकती हो?”
उसने विनम्रता से यह कहते हुए मना कर दिया कि, “अगर इसके लिए मेरे मालिक मुझे अनुमति देते हैं तो..। इसके अलावा, कई लोगों को यहाँ अभी मेरी सहायता की जरूरत होगी और इसलिए मुझे जाना होगा।”
“वैसे तुम्हारा नाम क्या है?” मैंने उस लड़की से पूछा।
“कलैवानी,” उसने उत्तर दिया।
उस लड़की की अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण की भावना, और अपने काम में उसकी पूरी भागीदारी ने मेरी पत्नी को सीधे उसके मालिक से बात करने के लिए प्रेरित किया। मेरी पत्नी ने उस लड़की के मालिक से कहा, “सर, वह लड़की कलैवानी है..।”
“हाँ बहुत मेहनती लड़की है,” मालिक ने कहा।
“यह मेरे पति विश्वनाथ हैं,” मेरी पत्नी ने मेरा परिचय उस लड़की के मालिक से कराया।
“आपसे मिलकर अच्छा लगा, सर।”
“यह वाशिंगटन पोस्ट में वरिष्ठ पत्रकार हैं,” मेरी पत्नी ने कहा।
यह सुन कर के मालिक एक दम से खड़ा हो गया, “वाशिंगटन पोस्ट?”
“हाँ सर, मैं इस लड़की का साक्षात्कार लेना चाहता हूँ। मैं इसकी नैतिकता से बहुत प्रभावित हूँ।”
मालिक ने उस लड़की को बुलाया। उस समय शाम के पाँच बज कर पैंतालीस मिनट हुए थे, “कलैवानी, यह अमेरिका से आए हैं। यह आपके साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं। क्या आप तैयार हैं?”
“सर, इस समय दुकान में बहुत सारे ग्राहक हैं और उन्हें मेरी मदद की जरूरत हो सकती है। यदि यह कल फिर से आ सकते हैं तो अच्छा होगा।” बड़ी ही सहजता से कलैवानी ने कहा।
“कोई परेशानी नहीं है, मैं कल फिर से आ सकता हूँ।” मैंने उस लड़की से कहा।
मैं अगले दिन सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ अपनी सभी नियुक्तियों को छोड़कर, उस लड़की को देखने आया कि क्या वह लड़की आज भी ग्राहकों के साथ व्यस्त तो नहीं है।
मेरी पत्नी और मुझे पता चला कि…
कलैवानी अरकाट के पास के गाँव की रहने वाली हैं। उसकी 5 बहनें हैं। वह सबसे बड़ी है। उसके पिता एक शराबी थे और अपने परिवार के प्रति कोई जिम्मेदारे नहीं निभाते थे। कुछ साल पहले उनकी मृत्यु हो गई। उसकी माँ चेन्नई में एक सहायक के रूप में काम करती थी और दो साल पहले अपनी सभी छह बेटियों को बेसहारा छोड़कर इस दुनिया से चली गईं। नवीं पास करने वाली इस लड़की ने नौकरी की तलाश करने का फैसला किया और ‘गिरी ट्रेडिंग’ उसकी मदद के लिए आगे आई। वह अपनी सभी 5 बहनों को अपने साथ ले आई और अपने अल्प वेतन से वह उनकी देखभाल कर रही है। सभी 5 बहनें पास के एक निगम स्कूल में पढ़ने जाती हैं।
मैंने साक्षात्कार के दौरान कलैवानी से पूछा, “तत्व बोध के बारे में जानने के लिए आपकी रुचि कब उत्पन्न हुई?”
“सर, यहाँ आने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि ग्राहकों की मदद करने का सबसे अच्छा तरीका है कि पहले उस विषय के बारे में मुझे पूरी जानकारी हो। मैंने स्वामी विवेकानंद पर छोटी छोटी किताबें लीं और पढ़ना शुरू किया। मुझे यह विषय इतना आकर्षक लगा कि मैंने दूसरे लेखकों की तमिल में लिखी पुस्तकों को भी पढ़ने का फैसला किया, जैसे भागवत गीता और विवेका चूड़ामणि जैसी किताबें…और इस तरह मेरी तत्व बोध के प्रति रुचि जागृत हुई।”
“आपका वेतन क्या है?” मैंने उससे एक और सवाल किया।
“2500 रुपये, सर।”
“क्या आप 5 बहनों के साथ अपने सभी खर्चों को पूरा करने में सक्षम हैं?”
“बिल्कुल नहीं सर, लेकिन मेरे मालिक मेरी बहुत मदद करते हैं?”
“जीवन में आपका लक्ष्य क्या है?”
“मैं चाहती हूँ कि मेरी सभी बहनों को शिक्षा मिले, ताकि आगे चल कर उन्हें आसानी से रोजगार मिल सके।”
मैंने उससे फिर पूछा, “अगर मैं आपके सभी खर्चों को पूरा करने के लिए मासिक 10,000 रुपये दूं तो क्या वह पर्याप्त होगा?”
“यह वास्तव में बहुत अधिक है, लेकिन यह पैसे भी मैं अपने मालिक के माध्यम से ही स्वीकार करूँगी,” उसने एक सरल समभाव से कहा।
हम कलैवानी के साथ उसके मालिक के पास गए और उनसे कहा कि, “हम हर महीने कलैवानी को 10,000 रुपये भेजना चाहते हैं ताकि उसकी बहनों की पढ़ाई अच्छे से हो जाए।”
मालिक ने एक आश्चर्य भरी मुस्कान के साथ कहा, “वह इसके योग्य है सर, और आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं। मैं हर महीने उसे राशि सौंप दूँगा या आप उसके नाम पर एक खाता खोल सकते हैं और सीधा उसके खाते में दस हजार रुपये भेज सकते हैं।”
मेरे दोस्त जॉन पॉल, जो टाइम्स ऑफ इंडिया के क्षेत्रीय प्रबंधक हैं, भी मेरे साथ आए थे। वो भी उस लड़की की प्रतिभा एवं सादगी से स्तब्ध थे। उन्होंने लड़की का समर्थन करने के हमारे फैसले की सराहना की और कहा, “आपने बहुत अच्छा काम किया है।” मुझे खुशी हुई, क्यूंकि मैं जानता था कि यह अच्छाई निश्चित रूप से उनके माध्यम से और भी फैलेगी।
मेरी पत्नी ने उत्तर में कहा, “मेरी बस यही प्रार्थना है कि करपगंबल, कलैवानी को वेदांत का विशेषज्ञ बनने में मदद करे और वह अमेरिका में वेदांत के बारे में व्याख्यान देना शुरू करें। हम उनके व्याख्यान की व्यवस्था कर सकते हैं।”
कलैवानी से मुलाकात के बाद हम बहुत देर तक यही सोचते रहे कि अगर हम अपने देश के अंदरूनी इलाकों में जाएँ तो हमें कलैवानी की ही तरह और कितने हीरे मिल सकते हैं…ऐसे पवित्र लोग, जो पूरी तरह से अपनी नैतिकता और कर्तव्यों पर केंद्रित होते हैं, और उनके आस-पास के सभी लोग उनकी यात्रा में मदद करने के लिए खुद-ब-खुद प्रेरित होते हैं। उस दिन मैंने अपने अंदर विनम्रता के एक अलग स्तर को महसूस किया है।
*"सच्चे लोग अपनी सादगी और पवित्रता में ही सन्तुष्ट रहते हैं। वे किसी को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करते।"*
दाजी












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