🌺 उच्चतम तक चेतना के विस्तार मैं और मेरी इच्छाएँ ही बाधक है 🌺
गुरु से विशुद्ध प्रेम और विश्वास चेतना को व्यापक और विस्तृत करते है- वीर ❣️
एक बार सुकरात समुद्र तट पर टहल रहे थे। उनकी नजर तट पर खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी। वे उसके पास गए और प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा, “तुम रो क्यों रहे हो?”
लड़के ने कहा, “यह जो मेरे हाथ में प्याला है न, मैं उसमें इस समुद्र को भरना चाहता हूँ, पर यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।”
बच्चे की बात सुनकर सुकरात विस्माद में चले गये और स्वयं भी रोने लगे। अब पूछने की बारी बच्चे की थी।
बच्चा कहने लगा, “आप भी मेरी तरह रोने लगे हो, पर आपका प्याला कहाँ है ?”
सुकरात ने जवाब दिया, “बालक, तुम छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहते हो और मैं अपनी छोटी – सी बुद्धि में सारे संसार की जानकारी भरना चाहता हूँ। आज तुमने मुझे सिखा दिया कि समुद्र प्याले में नहीं समा सकता है, मैं व्यर्थ ही बेचैन हो रहा था।”
यह सुन कर बच्चा एक पल के लिए ठहर गया , फिर उसने प्याले को दूर समुद्र में फेंक दिया और बोला, “सागर, अगर तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता तो क्या हुआ , मेरा प्याला तो तुम्हारे में समा सकता है।” इतना सुनते ही सुकरात बच्चे के पैरों में गिर पड़े और बोले, “तुम्हारी वजह से आज मुझे बहुत कीमती सूत्र मिला है।”
“हे परमात्मा!
आप तो सारा का सारा मुझ में नहीं समा सकते हैं, पर मैं तो सारा का सारा आपमें समा सकता हूँ।”
ईश्वर की खोज में भटकते सुकरात को ज्ञान देना था , तो भगवान उस बालक में समा गए। सुकरात का सारा अभिमान ध्वस्त कराया। जिस सुकरात से मिलने को सम्राटगण समय लेते थे ,वे सुकरात उस बच्चे के चरणों में गिर गए थे।
ईश्वर जब हमें अपनी शरण में लेते हैं, तब हमारे अंदर का “मैं” सबसे पहले मिटता है। या यूँ कहें जब हमारे अंदर का “मैं” मिटता है, तभी ईश्वर की कृपा होती है।
यह “मैं” वास्तव में “हमारा अहंकार” है , जो हमारी चेतना के विस्तार को रोकता है ।
*“आपके हृदय में वह विशाल समुद्र है , जिसे हम प्रेम कहते हैं। उसकी चाबी आपके हाथों में है।”*
दाजी












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