हमारी कमियों से हमें कौन अवगत कराता है, हमारा प्रशसंक या फिर हमारा आलोचक?
आलोचना
एक बार की बात है, एक सेल्स मैन को बिजनेस संबंधी बहुत जरूरी मीटिंग के लिए कहीं जाना था। घर से निकलने के पहले वह भगवान से प्रार्थना करता है- “हे भगवान! आज मुझे मेरे सारे दुश्मनों से मिलवा दो।” उसकी पत्नी उसकी ऐसी प्रार्थना सुनकर हैरान हो जाती है। वह पूछती है- “इतनी जरूरी मीटिंग के पहले यह क्या माँग रहे हो?”
सेल्स मैन अपनी पत्नी की ओर देखकर मुस्कुराता है और कहता है- “तुम अभी नही समझोगी।” और वह तैयार होकर मीटिंग के लिए रवाना हो जाता है।
घर से बाहर निकलते ही मानो उसकी ‘माँग’ पूरी होना शुरू हो जाती है। अभी कुछ ही दिन पहले वह सेल्समैन अपनी हाउसिंग सोसायटी का सेक्रेटरी चुना गया था। सोसाइटी का एक सदस्य जो इस कारण उससे ईर्ष्या रखता था, उसे तैयार होकर कहीं जाते हुए देखता है तो ताना मारते हुए कहता है, “ये आ गये सोसायटी के सेक्रेटरी साहब! पता नहीं, इन्हें क्यों सेक्रेटरी बना दिया गया। इनके न जूते साफ रहते हैं और न ही टाई ठीक तरह से बंधी होती है।” वह उस आदमी को देख कर सिर्फ मुस्कुराता है और निकल जाता है।
वह ऑफिस पहुँचता है। वहाँ उसका एक साथी कर्मचारी उसे देखकर मजाक उड़ाते हुए कहता है, “पता नहीं बॉस ने इसमें क्या देखा, जो इतनी जरूरी डील की मीटिंग इसे दे दी। इसके तो शरीर से ही कितनी बदबू आती है।” वह सेल्समैन उसे भी देख मुस्कुराता है और कॉफी मशीन की तरफ बढ़ जाता है।
वहाँ उसे अपना एक्स बॉस मिलता है। वह उससे कहता है, “तुझे तो मैंने पहले ही कहा था कि डिपार्टमेंट चेंज मत कर, अब फंस गया न मीटिंग-डील के चक्कर में। फैक्ट्स तो तुझे याद होते नहीं, तू प्रेजेंटेशन क्या देगा?” सेल्स मैन उसे भी देख मुस्कुराता है और अपनी जगह पर आ कर बैठ जाता है।
अब वह अपने सारे आलोचकों और विरोधियों की बातें याद करता है। उनके बताए अनुसार खुद में सुधार करता जाता है। वह अपने जूते अच्छे से साफ करता है। टाई ठीक से बांधता है। डियो खरीद कर लाता है और उसे लगाता है और फिर फैक्ट्स याद करने में जुट जाता है। पूरी तरह से तैयारी के साथ वह मीटिंग में जाता है और श्रेष्ठ प्रस्तुतीकरण (best presentation) देता है। उसकी डील पक्की हो जाती है।
दोस्तों, हम सभी लोग तारीफ सुनना बहुत पसंद करते हैं परंतु निंदा हमें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती। वास्तविकता तो यह है कि निंदा हमे निखारती है । हमारी जिंदगी में ऐसे कई लोग हमें मिलते हैं, जो हमें हतोत्साहित करते हैं, हमारी टांग खींचते हैं, हमें रोकते हैं। वे वास्तव में हमें हमारी कमियाँ बताते हैं। हमें उनसे परेशान होने के बजाय उनका फायदा उठाना चाहिए। उनकी सहायता से अपनी कमियों को पहचान कर यदि हम स्वयं में आवश्यक सुधार कर सकें तो हम सफलता की ओर आगे बढ़ते जाएँगे। वास्तव में, कई बार हमारे विरोधी हमें ऐसी सीख दे जाते हैं, जो हमारे अपने हमें नहीं दे पाते।
हम सभी ने यह कहावत तो सुनी ही है….
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
अर्थ: जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिक से अधिक पास रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियाँ बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है।
तो फिर हमारा सच्चा मित्र कौन है?
“आलोचना को गुस्सा या उदासी के बिना गम्भीरता से लें। ख़ुद को सुधारने के लिए इसका उपयोग करें और इसका स्वागत करें।”
चारीजी












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