सीखने और समझने के लिए क्या हमेशा शब्दों की जरूरत होती है?
बाँस का पेड़
एक प्रोफेसर अपने विद्यार्थियों के साथ जंगल भ्रमण के लिए गए। उनमे एक विद्यार्थी का नाम साकेत था। ढलान पर से गुजरते वक्त अचानक साकेत का पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की ओर लुढ़कने लगा।
वह खाई में गिरने ही वाला था कि तभी उसके हाथ में बाँस का एक पौधा आ गया। उसने बाँस के पौधे को मजबूती से पकड़ लिया और वह खाई में गिरने से बच गया।
बाँस धनुष की तरह तो मुड़ गया लेकिन न तो वह जमीन से उखड़ा और न ही टूटा। वह बाँस को मजबूती से पकड़कर लटका रहा। थोड़ी देर बाद उसके प्रोफेसर और दूसरे सभी साथी वहाँ पहुँच गए।
उन्होंने हाथ का सहारा देकर साकेत को ऊपर खींच लिया।
प्रोफेसर ने कुछ देर के बाद सबको अपने पास बुलाया और फिर साकेत से पूछा- “जान बचाने वाले बाँस ने तुमसे कुछ कहा, तुमने सुना क्या?”
सभी विद्यार्थी साकेत की और बड़ी उत्सुकता से देखने लगे।
साकेत ने कहा- “नहीं सर, शायद प्राण संकट में थे इसलिए मैंने ध्यान नहीं दिया और मुझे तो पेड़-पौधों की भाषा भी नहीं आती। कृपया आप ही बताइए न उसका संदेश।”
प्रोफेसर मुस्कुराए- “खाई में गिरते समय तुमने जिस बाँस को पकड़ लिया था, वह पूरी तरह से मुड़ गया था। फिर भी उसने तुम्हें सहारा दिया और तुम्हारी जान बची ली।”
प्रोफेसर ने बात आगे बढ़ाई- “बाँस ने तुम्हारे लिए जो संदेश दिया, वह मैं तुम्हें दिखाता हूँ।”
प्रोफेसर ने वहीं पास में खड़े बाँस के एक पौधे को खींचा औऱ फिर छोड़ दिया। बाँस लचककर अपनी जगह पर वापस लौट गया।
“हमें बाँस की इसी लचीलेपन की खूबी को अपनाना चाहिए। तेज हवाएँ बाँसों के झुरमुट को झकझोर कर पूरी तरह से उखाड़ने की कोशिश करती हैं, वह आगे-पीछे डोलता तो है पर मजबूती से धरती में जमा रहता है।”
“बाँस ने तुम सबके लिए यही संदेश भेजा है कि जीवन में जब भी मुश्किल दौर आए तो थोड़ा झुककर विनम्र बन जाना लेकिन टूटना नहीं क्योंकि बुरा दौर निकलते ही पुन: अपनी स्थिति में दोबारा पहुँच सकते हो।”
सभी विद्यार्थी बड़े गौर से सुनते रहे। प्रोफेसर ने आगे कहा- “बाँस न केवल हर तनाव को झेल जाता है बल्कि यह उस तनाव को अपनी शक्ति बना लेता है और दुगनी गति से ऊपर उठता है। बाँस ने कहा कि तुम अपने जीवन में इसी तरह लचीले बने रहना।”
प्रोफेसर ने कहा- “साकेत, पेड़-पौधों की भाषा मुझे भी नहीं आती। बेजुबान प्राणी-वृक्ष हमें अपने आचरण से बहुत कुछ सिखाते हैं।”
जीवन के कई अध्याय शब्दों से नही आचरण से ही सीख सकू
“चेतना का विस्तार हमारे अंदर लचीलापन को बढ़ाता जाता है और हमारे हठ को कम करता जाता है। यह फलों से लदे पेड़ की तरह है। लचीला पेड़ झुक कर जहाँ अधिक से अधिक फलों को संभाले रखता है वहीं सख़्त पेड़ टूट जाता है।”
दाजी









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