Jan Media TV

Inform Engage Inspire

Advertisement

मन जैसे सोचता है! देर सबेर हम वैसे बन जाते हैं!!

मन जैसे सोचता है! देर सबेर हम वैसे बन जाते हैं!!

हमारा मन जगत का सबसे बड़ा तीर्थ है ।संत जन कहते हैं ना कि “मन चंगा तो कठौती में गंगा”
इसलिए मन को सदा पवित्र रखना चाहिए क्योंकि हमारा मन जैसा होता है हम वैसे बन जते हैं। मन में किसी के लिए द्वेष नहीं रखना चाहिए।
कोई हमें अच्छा लगने लगता है, कोई हमें अच्छा नहीं लगता, क्योंकि कोई मन के अनुकूल है, कोई मन के अनुकूल नहीं।हमारा मन सदा अनुकूलता ढूंढ़ता है,जो हमारे मन के अनुकूल है वो पसंद है जो मन के अनुकूल नहीं वो पसंद नहीं।
कैंची का एक विशेष गुण होता है वो एक को अनेक बन देती है उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं होती।सुई का भी एक खास गुण होता है कि वो अनेक को एक कर देती है पर वो पदार्थ से एक सजातीय गुण लेती है एक तंतु,एक धागा लेती है और सिल देती है।अगर सिर्फ सुई चलती रहे तो वो कुछ नहीं कर पाएगी उसे सहारा चाहिए।हमारा मन भी सहारा चाहता है अनुकूलता ढूंढ़ता है।हमारा मन वहीं टिकता है जो हमारे मन के अनुकूल हो।
हमारा जीवन वैसा ही हो जाता है जैसे हमारे भाव होते हैं, जैसे हमारी सोच होती है।
इसलिए सन्त जन कहते हैं अच्छाई का संग करो,अच्छी संगत करो,क्योंकि जैसी संगत होती है वैसी रंगत हो जाती है।
हम हमेशा अपने मन के अनुकूल वातावरण ढूंढ़ते रहते हैं इसलिए हमें अपने मन को एक दिशा देनी है और वो दिशा गुरुजनों, संतो,महापुरषों के संग और विचारो से ही मिलेगी।वहीं से ये अनुकूलता मिलेगी जो जोड़ने का काम करेगा,शांति और सकून देगा,टूटे दिलो को जोड़ेगा।
अतः संत महापुरुषों का गुरुजनों का संग करके,सत्संग करके मन को ईश्वर में लगाकर देवत्व को प्राप्त कर “ईश्वर अंश जीव अविनाशी” के भाव को ग्रहण करके परमात्म तत्व की प्राप्ति करते हुए मानव तन सार्थक करें।

आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”
(ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र एवं वैदिक अनुष्ठानों के विशेषज्ञ)
संपर्क सूत्र – 09956629515
08318757871

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *