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आज का प्रेरक संस्मरण 300 वर्ष का योगी !

आज का प्रेरक संस्मरण

300 वर्ष का योगी !

  _वाराणसी की गलियों में एक दिगम्बर योगी घूमता रहता है. गृहस्थ लोग उसके नग्न वेश पर आपत्ति करते हैं. फिर भी पुलिस उसे पकड़ती नहीं. वाराणसी पुलिस की इस तरह की तीव्र आलोचनाएं हो रही थीं. आखिर वारंट निकालकर उस नंगे घूमने वाले साधू को जेल में बंद करने का आदेश दिया गया।_
  पुलिस के आठ- दस जवानों ने पता लगाया. मालूम हुआ वह योगी इस समय मणिकर्णिका घाट पर बैठा हुआ है। जेष्ठ की चिलचिलाती दोपहरी. घर से बाहर निकलना भी कठिन होता है. इस समय एक योगी को मणिकर्णिका घाट के एक जलते तवे की भाँति गर्म पत्थर पर बैठे देख पुलिस पहले तो सकपकायी. पर आखिर पकड़ना तो था ही वे आगे बढ़े।
 योगी पुलिस वालों को देखकर ऐसे मुस्करा रहा था मानों वह उनकी सारी चाल समझ रहा हो।
 _योगीजी कुछ इस प्रकार निश्चिन्त बैठे हुये थे मानों वह वाराणसी के ब्रह्मा हों किसी से भी उन्हें भय न हो।_     
  मामूली कानूनी अधिकार पाकर पुलिस का दरोगा जब किसी से नहीं डरता तो अनेक सिद्धियों सामर्थ्यों का स्वामी योगी भला किसी से भय क्यों खाने लगा. 

 पुलिस मुश्किल से दो गज पर थी कि तैलंग स्वामी उठ खड़े हुए. वे वहाँ से गंगा जी की तरफ भागे। पुलिस वालों ने पीछा किया।
स्वामी जी गंगा में कूद गये पुलिस के जवान बेचारे वर्दी भीगने के डर से कूदे तो नहीं, हाँ चारों तरफ से घेरा डाल दिया. कभी तो निकलेगा साधु का बच्चा.
लेकिन एक घंटा, दो घंटा, तीन घंटा- सूर्य भगवान् सिर के ऊपर थे अब अस्ताचलगामी हो चले. स्वामी जी प्रकट न हुए.
 उन्होंने एक बहुत बड़ी शिला पानी के अंदर फेंक रखी थी. पानी में डुबकी लगा जाने के बाद उसी शिला पर घंटों समाधि लगायें जल के भीतर ही बैठे रहते हैं।

उनको किसी ने कुछ खाते पीते नहीं देखा. मेडिकल रिपोर्ट में उनकी आयु 300 वर्ष की बताई गई है। निराहार रहने पर भी प्रतिवर्ष उनका वजन एक पौण्ड बढ़ जाता था।
300 पौंड वजन था उनका जिस समय पुलिस उन्हें पकड़ने गई. इतना स्थूल शरीर होने पर भी पुलिस उन्हें पकड़ न सकी।
आखिर जब रात हो चली तो सिपाहियों ने सोचा डूब गया. वे दूसरा प्रबन्ध करने के लिए थाने लौट गये. इस बीच अन्य लोग बराबर तमाशा देखते रहे. पर तैलंग स्वामी पानी के बाहर नहीं निकले।

प्रातः काल पुलिस फिर वहाँ पहुँची। स्वामी जी इस तरह मुस्करा रहे थे मानों उनके जीवन में सिवाय मुस्कान और आनंद के और कुछ हो ही नहीं.
ऊर्जा तो आखिर ऊर्जा ही है. संसार में उसी का ही तो आनंद है। योग द्वारा सम्पादित शक्तियों का स्वामी जी रसास्वादन कर रहे हैं तो आश्चर्य क्या।
इस बार भी जैसे ही पुलिस पास पहुँची स्वामी फिर गंगा जी की ओर भागे. वो उस पार जा रही नाव के मल्ला को पुकारते हुए पानी में कूद पड़े।
लोगों को आशा थी कि स्वामी जी कल की तरह आज भी पानी के अंदर छुपेंगे. जिस प्रकार मेढ़क मिट्टी के अंदर और रीछ बर्फ के नीचे दबे बिना श्वाँस के पड़े रहते हैं उसी प्रकार स्वामी जी भी पानी के अंदर समाधि ले लेंगे. किन्तु यह क्या?
जिस प्रकार से वायुयान दोनों पंखों की मदद से इतने सारे भार को हवा में संतुलित कर तैरता चला जाता है उसी प्रकार तैलंग स्वामी पानी में इस प्रकार दौड़ते हुए भागे मानों वह जमीन पर दौड़ रहे हों।
नाव उस पार नहीं पहुँच पाई. स्वामी जी पहुँच गये। पुलिस खड़ी देखती रह गई।

स्वामी जी ने सोचा कि पुलिस बहुत परेशान हो गई. तो वह एक दिन पुनः मणिकर्णिका घाट पर प्रकट हुए. अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया।
तैलंग स्वामी भी सामाजिक नियमोपनियमों की अवहेलना नहीं करना चाहते थे. यह प्रदर्शित करना आवश्यक भी था कि योग और अध्यात्म की शक्ति भौतिक शक्तियों से बहुत आगे चढ़-बढ़ कर है. तभी वे दो बार पुलिस को छकाने के बाद इस प्रकार चुपचाप ऐसे बैठे रहे मानों उनको कुछ पता ही न हो।
 हथकड़ी डालकर पुलिस तैलंग स्वामी को पकड़ ले गई. हवालात में बंद कर दिया। इन्सपेक्टर पूरी रात गहरी नींद सोया. उसे स्वामी जी की गिरफ्तारी सफलता लग रही थी।
  _यह घटना “मिस्ट्रीज आँ इंडिया इट्स योगीज” नामक लुई-द-कार्टा लिखित पुस्तक भी दर्ज है। स्वामी योगानंद ने भी इस घटना का वर्णन अपनी पुस्तक “आटो बाई ग्राफी आँ योगी” के 31वें परिच्छेद में किया है।_

 प्रातः काल ठंडी हवा बह रही थी. थानेदार जी हवालात की तरफ आगे बढ़े. वे तब पसीने में डूब गए - जब उन्होंने योगी तैलंग को हवालात की छत पर मजे से टहलते और वायु सेवन करते देखा। हवालात के दरवाजे बंद थे, ताला भी लग रखा था।
 _फिर यह योगी छत पर कैसे पहुँच गया ? अवश्य ही संतरी की बदमाशी होगी। उन बेचारे संतरियों ने बहुतेरा कहा कि हवालात का दरवाजा एक क्षण को खुला नहीं फिर पता नहीं साधु महोदय छत पर कैसे पहुँच गये। वे इसे योग की महिमा मान रहे थे पर इन्सपेक्टर उसके लिए बिलकुल तैयार नहीं था._
 आखिर योगी को फिर हवालात में बंद किया गया। रात दरवाजे में लगे ताले को सील किया गया. चारों तरफ गहरा पहरा लगा. ताला लगाकर थानेदार थाने में ही सोया।
_सवेरे बड़ी जल्दी कैदी की हालत देखने उठे तो फिर शरीर में काटो तो खून नहीं। सील बंद ताला बाकायदा बंद। सन्तरी पहरा भी दे रहे उस पर भी तैलंग स्वामी छत पर बैठे प्राणायाम का अभ्यास कर रहे।_
 थानेदार की आँखें खुली की खुली रह गईं उसने तैलंग स्वामी को आखिर छोड़ ही दिया।

 एक नास्तिक सिरफिरे ने चूने के पानी को ले जाकर स्वामी जी के सम्मुख रख दिया और कहा महात्मन् ! आपके लिए बढ़िया दूध लाया हूँ.

स्वामी जी उठाकर पी गये उस चूने के पानी को. अभी कुछ ही क्षण हुये थे कि वो आदमी कराहने और चिल्लाने लगा, जिसने चूने का पानी पिलाया था। स्वामी जी के पैरों में गिरा, क्षमा याचना की तब कहीं जाकर पेट की जलन समाप्त हुई।
योगीजी ने कहा भाई मेरा कसूर नहीं है. यह तो न्यूटन का नियम है कि हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया अवश्य होती है।

मनुष्य शरीर एक यंत्र है. प्राणशक्ति उसकी ऊर्जा है. प्रेम और ध्यान ईंधन है. मन इंजन है. कुशल ड्राइवर द्वारा इसे चाहे जिस प्रकार चलाया जा सकता हैं. इस शरीर में भौतिक विज्ञान से भी अद्भुत शक्तियाँ हैं. पर यह सब शक्तियाँ और सामर्थ्य ध्यान साधना में सन्निहित हैं. इन्हें अधिकारी पात्र ही पाते हैं. वे ही परम आनन्द का लाभ प्राप्त करते रहे

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